कुत्ते की जंजीर से बांधकर किया था अरुणा का रेप, पढ़ें खौफ का वो दिन
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42 साल पहले कोमा में गई नर्स अरुणा शानबाग की सोमवार को मौत हो गई है। लेकिन उसको कोमा में पहुंचाने वाला दरिंदा अभी भी खुला घूम रहा है।
अरुणा के साथ ऐसा क्या हुआ जिससे उसे 42 साल तक कोमा में रहना पड़ा? और कहां है वह हैवान जिसने अरुणा की जिंदगी तबाह की?
27 नवंबर 1973 को अरुण शानबाग मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में एक नर्स के रूप में काम कर रही थी। अस्पताल के ही एक कर्मचारी सोहनलाल भर्था वालमीकि ने अरुणा को कुत्ते बांधने वाली जंजीर से बांधकर यौन शोषण किया जिससे अरुणा के दिमाग में ऑक्सीजन और खून की कमी हो गई और वह कोमा में चली गई।
यौन शोषण के दौरान सोहनलाल ने अरुणा को बुरी तरह से प्रताड़ित भी किया और उसके पैसे छीन लिए थे।
सोहनलाल के खिलाफ नहीं दर्ज हुआ रेप का मामला
सोहनलाल वालमीकि अस्पताल में वार्डब्याय और स्वीपर के रूप में काम कर रहा था जिसे 28 नवंबर 1973 को अरुणा के रेप बाद गिरफ्तार कर लिया गया।
धीरे-धीरे अरुणा को दिखाई-सुनाई देना बंद कर दिया और उसे लगवा मार गया। इसके बाद से अरुणा को लाइफ सपोर्ट सिस्टम में रखा गया और उसे पाइप नली के जरिए तरल पदार्थ दिया जाने लगा।
मुंबई पुलिस ने 1974 में सोहनलाल के खिलाफ डकैती (अरुणा की कमाई लूटने) और हत्या का प्रयास करने का मामला दर्ज किया लेकिन रेप के लिए मामला दर्ज नहीं किया गया। पुलिस ने अपने रिकॉर्ड में यह भी नहीं दिखाया कि अरुणा का यौन शोषण हुआ है।
स्थानीय अदालत ने सोहनलाल के खिलाफ दर्ज धाराओं के आधार पर साल ही सजा दी। सजा के दौरान सोहनलाल एक साल पहले ही जेल में गुजार चुका था। इसलिए उसकी सजा एक साल कम करके छह साल कर दी गई थी।
खुला घूम रहा है अरुणा का हत्यारा
1980 में छह साल की सजा पूरी कर सोहनलाल जेल से बाहर आ गया। खबरों अनुसार सोहनलाल इसके बाद से दिल्ली में आकर रहने लगा था।
इसी दौरान मुंबई नगर निगम ने अरुणा का अस्पताल से बाहर स्थानांतरित करने के लिए कई बार प्रयास किया लेकिन अस्पताल की नर्सों इसके विरोध में हड़ताल शुरू कर दी जिसके चलते अरुणा को अस्पताल से बाहर नहीं किया जा सका। नगर निगम का तर्क था कि अरुणा ने एक बिस्तर व्यस्त कर रखा है जिससे दूसरों को इलाज कराने में दिक्कत हो रही है।
2009 में अरुणा की कहानी समाज के सामने लाने वाली एक महिला पत्रकार वीरानी ने अरुणा को जबरन पाइप के जरिए खाना देने को रुकवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की। इस अर्जी के परिणाम स्वरूप 24 जनवरी 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने निरीक्षण के लिए एक चिकित्सीय टीम का गठन किया।
चिकित्सीय टीम ने एक महीने बाद अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को दी जिसमें कहा गया कि अरुणा के जीवन के लिए सभी जरूरी तत्व पाइप नली के जरिए ही दी जा रही हैं। इसके बाद सुप्रीप कोर्ट ने सात मार्च 2011 को पत्रकार वीरानी की याचिका खारिज कर दी।