आरुषि मामले में सबसे अहम रहे ये 5 सबूत

टीम डिजिटल, ब्यूरो/अमर उजाला नोएडा Updated Mon, 25 Nov 2013 03:57 PM IST
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5 most important things in aarushi-hemraj murder case

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लंबे वक्त तक आरुषि-हेमराज हत्याकांड एक बड़ा राज बना रहा और इस मामले से जुड़ी हरेक चीज को जांच एजेंसियों ने अपराधी तक पहुंचने की सबसे अहम कड़ी के रूप में देखा।
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भले कुछ चीजें अब तक न मिली हों, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ सामान ऐसा है, जो हर गुनाह में अहम किरदार अदा करता है और इस मामले में भी ऐसा ही था।
पढ़ें, आरुषि-हेमराज का हत्यारा कौन?

आइए निगाह डालते हैं, उन पांच अहम चीजों पर जिन्होंने कभी सवाल खड़े किए, तो कभी सवालों के जवाब भी तलाशे। इस हैरतअंगेज मर्डर मिस्ट्री से जुड़ी पांच अहम चीजों पर गौर करें।

1. आरुषि का मोबाइल फोन

mobile
आरुषि आम तौर पर आधी रात तक अपने फोन पर बिजी रहती थी, लेकिन घटना की रात उसके फोन पर आखिरी कॉल 9.10 बजे आई और इसके बाद फोन स्विच-ऑफ कर दिया गया। एक दोस्त ने लैंडलाइन पर भी फोन किया, लेकिन कोई कामयाबी नहीं मिली। मोबाइल फोन हत्या के बाद गायब हो गया था, जो 12 सितंबर 2009 तक नहीं मिला। जब फोन मिला, तो उसे जांच-पड़ताल के लिए सीएफएसएल, हैदराबाद भेजा गया, जहां यह पुष्ट हुआ कि आरुषि के फोन और बरामद किए गए सेट का आईएमईआई नंबर एक है। हालांकि, यह बात हैरत में डालने वाली है कि फोन का एमएमसी कार्ड और फोन की मेमोरी साफ कर दी गई थी। जाहिर है, आरुषि से जुड़ी कोई जानकारी नहीं मिल सकी, क्योंकि एसएमएस, एमएमएस, फोन बुक, लॉग बुक सभी चीजें डिलीट की जा चुकी थीं।

2. डॉ. राजेश का गोल्फ स्टिक, सर्जिकल टूल

golf stickअपनी दलील में सीबीआई ने कहा था कि डॉ. राजेश ने गोल्फ स्टिक से ये हत्याएं कीं, लेकिन इसमें भी पेंच रहा। बचाव पक्ष का कहना था कि गोल्फ स्टिक को अपराध से जोड़ने वाले कोई वैज्ञानिक सबूत मौजूद नहीं हैं। बचाव पक्ष का कहना था कि लोहे का गोल्फ स्टिक नंबर 5, जिसे आला-ए-कत्ल बताया गया, वो उन दो स्टिक में शामिल नहीं, जिन्हें सीएफएसएल ने दूसरों से ज्यादा साफ बताया था। सीएफएसएल की रिपोर्ट के मुताबिक डॉ राजेश के यहां से मिले 12 गोल्फ क्लबो में से दो नंबर 4 और नंबर 5, दोनों पर दूसरों की तुलना में कम मिट्टी थी। यह भी हैरानी की बात रही कि सीएफएसएल ने अपनी रिपोर्ट में साफ किया है कि उसे 12 गोल्फ स्टिकों में से किसी पर भी खून के कोई निशान नहीं मिले। इसके अलावा यह भी कहा गया कि हत्या में सर्जिकल टूल का इस्तेमाल हुआ, लेकिन जांच एजेंसी इसकी बरामदगी भी नहीं दिखा सकी।

3. मेन गेट की चाबी

KEYहर रोज की तरह 16 जुलाई, 2008 की सुबह छह बजे जब नौकरानी भारती ने डॉ राजेश की डोरबेल बजाई, तो दरवाजा हेमराज ने नहीं खोला। नूपुर ने भारती को बताया कि मिडल ग्रिल का दरवाजा बंद है। वह हेमराज के कमरे से चाबी लाई और अंदर से खोलने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रही। डॉ. नूपुर ने भारती से कहा कि शायद ताला बाहर से लगाया गया है। नूपुर का दावा है कि जब उसने चाबी फेंकी, तब तक आरुषि के मारे जाने की खबर उन्हें नहीं थी। भारती ने बाहर से दरवाजा खोला और भीतर दाखिल हुई। जब देखा, तो डॉ राजेश और नूपुर रो रहे थे। भारती ने सवाल किया, तो उन्होंने कथित तौर पर कहा, "देखो, हेमराज क्या करके गया है?" भारती ने सभी को सूचित किया। सवाल उठता है कि अगर मारे गए लोग और जीवित लोग, सभी घर के अंदर थे, तो कोई बाहर से ताला कैसा लगा सकता है?

4. इंटरनेट का राउटर

net
जांच में इस बात का खुलासा भी हुआ 15 जुलाई, 2008 की रात डॉ राजेश तलवार ने इंटरनेट का इस्तेमाल किया था और आखिरी बार एक्सेस भी उन्होंने ही किया। वह रात 12 बजे के बाद तक इंटरनेट इस्तेमाल कर रहे थे। उन्होंने डॉ. नूपुर तलवार से इंटरनेट राउटर स्विच ऑन करने के लिए कहा था, जो आरुषि के कमरे में था। ऐसे में यह कैसे मुमकिन है कि उसके कमरे में क्या चल रहा था, इसका अंदाजा उन्हें न हुआ हो। इसके अलावा आरुषि के एक करीबी दोस्त अनमोल ने जांच एजेंसियों को बताया कि उसने किशोरी का सेलफोन न लगने पर लैंडलाइन पर फोन किया था, जो डॉ राजेश के बेडरूम में रखा है। वह आरुषि से बात करना चाहता था। लेकिन उसका कहना है कि कई बार कॉल करने पर भी किसी ने फोन नहीं उठाया। ये कॉल आधी रात में की गईं। सवाल बनता है कि डॉ राजेश या उनकी पत्नी ने फोन क्यों नहीं उठाया?

5. टेरेस वाला दरवाजा

doorघटना की जानकारी मिलने पर जब स्थानीय पुलिस घटनास्थल पर पहुंची, तो डॉ राजेश ने उन्हें बताया कि हेमराज ने उनकी बेटी की हत्या कर दी है। आरुषि का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया था। तब तक डॉ राजेश के दोस्त डॉ राजीव कुमार और डॉ रोहित कोचर उनके घर पहुंच गए थे। उनकी नजर टेरेस डोर के हैंडल पर पड़े खून के निशान पर गई। उन्हें ऊपर की सीढ़ियों पर खून के निशान वाले कदम और धब्बे भी दिखे, जिन्हें साफ करने की कोशिश हुई थी। उन्होंने डॉ राजेश से टेरेस डोर की चाबी के बारे में पूछा, लेकिन वह इन निशानों को देखने के बाद भीतर चले गए। पुलिस 16 मई, 2008 को यह दरवाजा खुलवाने में कामयाब नहीं हो सकी, क्योंकि डॉ राजेश बार-बार पुलिस से कह रहे थे कि फ्लैट में वक्त बर्बाद करने के बजाय उन्हें हेमराज को खोजना चाहिए। हकीकत यह है कि हेमराज का शव छत पर पड़ा था और चाबी मिलने पर उस तक पहुंचना आसान होता।
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