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पुलिस की 5 गलतियां, जिनसे उलझा आरुषि मर्डर केस

Tue, 26 Nov 2013 07:38 AM IST
टीम डिजिटल, ब्यूरो/अमर उजाला नोएडा
टीम डिजिटल, ब्यूरो/अमर उजाला नोएडा Updated Tue, 26 Nov 2013 07:38 AM IST
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5 major police investigation flaws in aarushi-hemraj murer case

आरुषि हत्याकांड जितना सनसनीखेज रहा, उसकी जांच से जुड़ी खामियां भी उतनी ही हैरानी पैदा करने वाली हैं। एक वक्त ऐसा था जब इस मामले में सीबीआई ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए थे।

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29 दिसंबर, 2010 को सीबीआई ने गाजियाबाद अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करते हुए कहा कि मौका-ए-वारदात पर कोई सबूत उपलब्ध नहीं हैं, ऐसे में यह जांच किसी नतीजे तक नहीं पहुंच रही।
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सीबीआई के पास जांच का जिम्मा आने से पहले पुलिस ने इस मामले में 'घोर लापरवाही' दिखाई, जिसका जिक्र सीबीआई कई बार कर चुकी है।

पढ़ें, आरुषि-हेमराज का हत्यारा कौन?
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यूं तो जांच का जिम्मा संभालने वाले एजेंसियों ने अपनी लापरवाही के कई सबूत दिए, लेकिन इस हाई-प्रोफाइल मामले की तफ्तीश में पांच ऐसे सुराख हैं, जो अलग ही नजर आते हैं। गौर कीजिए:

1. ये कैसी जांच? कनफ्यूज करने वाली दो कहानियां
एक घर में दो लोगों की हत्या हो जाती है और जो दो लोग उस घर में मौजूद थे, उनका दावा है कि उन्हें इसकी कानोंकान खबर नहीं हुई। जानकारों का कहना है कि इस मामले की जांच दो थ्योरी पर आधारित थी। पहला यह कि आरुषि की हत्या हेमराज ने की है, जो तलवार परिवार का नौकर था। तलवार दंपति ने भी शुरुआत में कुछ इसी तरह के बयान दिए थे। शक की सुई हेमराज की तरफ थी और उसके साथ-साथ तलवार परिवार की दोस्त अनीता दुर्रानी के नौकर राजकुमार, डॉ. राजेश तलवार के कम्पाउंडर कृष्णा और उनके पड़ोस में रहने वाले सैन्य अधिकारी के नौकर विजय मंडल पर भी। लेकिन कुछ ही वक्त बाद घर की छत से हेमराज का शव मिलने से सारी कहानी पलट गई। जिस नौकर को हत्यारा बताया जा रहा था, वो खुद भी मारा गया। अब संदेह की सुई घूमी तलवार परिवार पर। हालांकि, एक तबका यह भी मानता है कि घटना वाली रात डॉ. राजेश और नूपुर घर में मौजूद ही नहीं थे।

पढ़ें, आरुषि-हेमराज हत्याकांड जैसे 5 हाई-प्रोफाइल मामले

2. कैसी पुलिस? घटनास्थल से इतनी छेड़छाड़!
इस मामले की जांच को लेकर पुलिस शुरुआत से कठघरे में खड़ी होती रही। सीबीआई के जांचकर्ताओं का कहना है कि नोएडा पुलिस ने इसे संभालने को लेकर जरा भी संजीदगी या पेशेवराना रवैया नहीं दिखाया। सीबीआई का दावा है कि पुलिस ने बेहद लापरवाही दिखाई और बचकाने तरीके से मामले की शुरुआती जांच अंजाम दी गई। जांच एजेंसी का मानना है कि मौका-ए-वारदात पर 90 फीसदी से ज्यादा सबूत बचाए नहीं जा सके। हेमराज के कमरे में व्हिस्की की बोतल पड़ी थी, जिस पर पड़े उंगलियों के निशान लेने में पुलिस नाकाम साबित हुई। ऐसा बताया जाता है कि मीडियाकर्मियों को घर में दाखिल नहीं होने दिया और पुलिस ने केवल राजेश की कही बात पर अपनी जांच शुरू कर दी।


3. वैज्ञानिक टेस्ट भी इम्तहान में फेल!
पुलिस और सीबीआई ने जांच के दौरान जो कोशिश की, उसकी बात तो कई बार हो चुकी है। इस दौरान यह बात भी काबिल-ए-गौर है कि तमाम वैज्ञानिक टेस्ट भी किसी काम न आए। यह बात साबित करने के लिए सीबीआई ने अपनी तरफ से कई सबूत पेश किए कि घटना वाली रात तलवार दंपति घर में मौजूद थे। जाहिर है, उन पर शक शुरू से रहा। लेकिन जब जांच एजेंसियों ने डॉ. राजेश तलवार, उनके कम्पाउंडर कृष्णा (उर्फ किशन) और तलवार के पड़ोसी के नौकर विजय मंडल का पॉलिग्राफ टेस्ट और नार्को एनालिसिस समेत लाई डिटेक्टर टेस्ट किया, तो भी कोई नतीजा हाथ नहीं लगा। जांच एजेंसी का दावा था कि इन तमाम टेस्ट से वह दूध का दूध और पानी का पानी करने में कामयाब साबित होंगी, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीँ। तलवार दंपति और उनके सहयोगियों का दो-दो बार पॉलिग्राफ, ब्रैन मैपिंग, लाई डिटेक्टर और नार्को एनालिसिस हुआ था।

4. पोस्टमॉर्टम करते वक्त भी बरती लापरवाही
सीबीआई का यह भी कहना है कि पुलिस ने हेमराज और आरुषि का पोस्टमॉर्टम कराने का काम ऐसे डॉक्टरों को सौंपा, जो विशेष रूप से फॉरेंसिक पैथोलॉजी में सिद्धहस्त नहीं थे। यह बहुत जाहिर सी बात है कि पीड़ित की त्वचा से हत्यारे और पीड़ित की उंगलियों के निशान लेने की एक तय प्रक्रिया है। लेकिन डॉक्टरों ने इस बात पर जरा ध्यान नहीं दिया और शवों से फिंगरप्रिंट लेने के लिए फॉरेंसिक वैज्ञानिकों को बुलाने या उनकी मदद लेने की जहमत नहीं उठाई। इसके अलावा 11 अगस्त, 2008 को सीबीआई ने कह दिया था कि उसे ऐसे सबूत मिले हैं, जो हत्याओं के वक्त मकान में किसी पांचवें शख्स की मौजूदगी की तस्दीक करते हैं, क्योंकि उसकी उंगलियों के निशान आरुषि, हेमराज, डॉ राजेश और नूपुर से मेल नहीं खाते। हालांकि, यह आज तक साफ नहीं हो सका कि अगर सीबीआई को इस थ्योरी पर यकीन था, तो आज तक यह क्यों पता नहीं लग पाया कि वह पांचवां शख्स कौन था।

5. कहां गए अहम सबूत, आज तक नहीं पता?
हैरानी की बात यह है कि आला-ए-कत्ल यानी जिस हथियार से हत्याएं हुईं, वे आज तक नहीं मिले। इसके अलावा हेमराज का मोबाइल फोन आज तक पुलिस या सीबीआई के हाथ नहीं लगा। साथ ही आरुषि के मोबाइल फोन तक भी सीबीआई नहीं पहुंच सकी। हालांकि, उसका मोबाइल घटना के दो साल बाद बुलंदशहर के एक गांव से मिला, लेकिन उस तक पहुंचने वाली एजेंसी थी दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच। इसके अलावा सीबीआई तलवार दंपति की दलील को पूरी तरह खारिज नहीं कर सकी। सूत्रों का कहना है कि जांच में यह पता नहीं लग सका कि हत्याओं का मकसद क्या था। इसके अलावा तलवार दंपति का दावा था कि एसी के शोर की वजह से वह बराबर वाले कमरे की आवाज नहीं सुन सके। जब घटनाक्रम की डमी की गई, तो यह लगा कि ऐसा मुमकिन भी है। हत्याओं में गोल्फ स्टिक और सर्जिकल टूल के इस्तेमाल की भी बात कही जाती रही, लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा।

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