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पेट्रोल की कीमत कम होने से कौन है परेशान?

Thu, 27 Nov 2014 06:44 PM IST
Updated Thu, 27 Nov 2014 06:44 PM IST
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who is in problem after reducing price of oil?

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में जून 2014 से अब तक 30 प्रतिशत की कमी आई है। कच्चे तेल की कीमतों में आई कमी के बरक़रार रहने से चिंतित ओपेक (ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज़) के 12 सदस्य देशों के ऊर्जा मंत्री वियना में बैठक करने वाले हैं।

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वियना में होने वाली बैठक में सदस्य देश कीमतों में आ रही गिरावट को रोकने के लिए तेल उत्पादन में कटौती का फैसला लेते हैं या नहीं, इस पर सबकी नज़र रहेगी। कई देशों के लिए तेल की कम हो रही कीमतें गंभीर मुसीबत का कारण हैं क्योंकि उनका सरकारी बजट तेल से होने वाली आमदनी पर निर्भर है।
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तेल के शीर्ष निर्यातक देश सऊदी अरब की बात करें तो इसका लगभग 90 फ़ीसदी राजस्व तेल से ही आता है। हालांकि यह तेल की मौजूदा कीमत से निपटने की बेहतर स्थिति में है। लेकिन ईरान, वेनेजुएला, नाइजीरिया और ओपेक के बाहर रूस के लिए भी तेल की कम कीमतें गंभीर समस्या है।
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दुविधा वाली स्थिति

who is in problem after reducing price of oil?

तेल की गिरती कीमतों से निपटने में ओपेक की भूमिका फिलहाल अनिश्चित नज़र आ रही है। ईरान और वेनेजुएला सहित ओपेक के कई देश चाहते हैं कि तेल उत्पादन में कटौती की जाए जबकि कुवैत ऐसा नहीं चाहता। ऐसा इसलिए क्योंकि कुवैत और खाड़ी के दूसरे कई देश कम हो रही कीमतों से बेहतर तरीके से निपटने की स्थिति में हैं।

हमेशा से तेल बाज़ार की स्थिरता में बड़ी भूमिका निभाने वाला सऊदी अरब भी इस बार किसी तरह की जिम्मेदारी निभाने से बच रहा है। ब्लूमबर्ग कंपनी के 20 विशेषज्ञों की ओर से किए गए हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक आधे लोगों को उम्मीद है कि ओपेक कोई न कोई राह निकालेगा, जबकि आधे नाउम्मीद हो चुके हैं।

मांग और पूर्ति

who is in problem after reducing price of oil?

ओपेक संकट बाज़ार में तेल की मांग और आपूर्ति दोनों पक्षों में नज़र आता है। यूरोपीय यूनियन और चीन जैसी दूसरी कई और उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों में विकास के सुस्त पड़ जाने से वैश्विक बाज़ार कमजोर हुआ है। इसका तेल की मांग पर बुरा असर पड़ा है। इसके विपरीत अमरीका में कच्चे तेल का कारोबार बढ़ने से तेल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।

मौजूदा परिस्थितियों में एक ध्यान देने लायक बात ये है कि मध्य-पूर्व की अस्थिरता और इस्लामिक स्टेट के उभार का भी कीमतों पर असर पड़ा है। लीबिया में स्थानीय संघर्ष के कारण तेल उद्योग बाज़ार पूरी तरह शांत रहा।

तेल की गिरती कीमतों के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। वियना में ओपेक सम्मेलन के पहले सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री अल नैमी।

उनमें से एक ये कि सऊदी अरब ने जानबूझ कर तेल की आपूर्ति अधिक और कीमत कम रखी ताकि कच्चे तेल में कम मुनाफा हो और इससे मुकाबला कमजोर पड़ जाए। तो कुछ का मानना है कि तेल की कीमतों में कमी आने से अमरीका और सऊदी अरब को फ़ायदा होता है।

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