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खजाने में जमा है धन, तरस रहे गरीब

Mon, 24 Dec 2012 10:56 PM IST
नई दिल्ली/विजय गुप्ता
नई दिल्ली/विजय गुप्ता Updated Mon, 24 Dec 2012 10:56 PM IST
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wealth accumulated treasures but poor are craving

पंचायतीराज व्यवस्था लागू होने के दो दशक बीत जाने के बावजूद इसकी योजनाओं का लाभ ग्रामीण गरीबों तक नहीं पहुंच पा रहा है। पर्याप्त धन न मिलने के कारण योजनाओं के क्रियान्वयन में लेट-लतीफी तो समझ में आती है लेकिन जब खजाने में धन उपलब्ध हो और गरीब सुविधाओं के लिए तरसते रहें तो इसे सरकार की लापरवाही ही कहा जाएगा।

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ग्रामीण विकास मंत्रालय की स्थायी समिति ने पंचायती राज मंत्रालय को आवंटित राशि का उपयोग न किए जाने पर ऐसी टिप्पणी की है। समिति ने फटकार लगाते हुए कहा कि बार- बार कहने के बावजूद मंत्रालय के पास बहुत सी योजनाओं की आवंटित धनराशि बिना उपयोग के पड़ी है। खासतौर पर पिछड़ा क्षेत्र अनुदान फंड (बीआरजीएफ) के मामले में, जो कि राज्यों के योजना व्यय के लिए केंद्रीय सरकार की सहायता योजना है।
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बीआरजीएफ पंचायती राज मंत्रालय की सबसे प्रमुख योजना है। योजना का लक्ष्य क्षेत्रीय असामानता और असंतुलन को दूर करने के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना है। राज्य सरकारें केंद्र की इस सहायता का उपयोग संबंधित क्षेत्र  के विकास के लिए चलाई जा रही योजनाओं को पूरा करने में करते हैं।
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समिति ने पाया कि योजनाओं के लिए आवंटित धन का उपयोग न करने के कारण 31 दिसंबर 2011 को पंचायती राज मंत्रालय के पास 4880 करोड़ रुपये जमा थे। इसमें 4724 करोड़ रुपए बीआरजीएफ  से संबंधित थे पर 31 मार्च 2012 को भी 4572 करोड़ बचे रह गए।

समिति ने ने मंत्रालय को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि इस तरह से कीमती धनराशि गैर जिम्मेदार तरीके से बिना खर्च के पड़े रहना स्वीकार नहीं किया जाएगा। हालांकि मंत्रालय ने समिति को भेजे गए जवाब में सफाई देते हुए कहा कि बिना खर्च हुए का मतलब यह नहीं है कि धनराशि मंत्रालय के पास रखी है। वास्तव में उपरोक्त राशि राज्यों को दी गई होती है पर इसका प्रयोग प्रमाण पत्र मंत्रालय को नहीं मिला होता है। इन परिस्थितियों में मंत्रालय उसे बिना खर्च हुई राशि मानता है।


मंत्रालय के इन तर्कों पर समिति ने कहा कि वह इस जवाब से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। सरकार को इस समस्या का जमीनी हल ढ़ूढ़ना चाहिए। नही तो ऐसा भी संभव है कि किसी साल मंत्रालय का बिना खर्च हुआ धन उसके आवंटित बजट से ज्यादा न हो जाए।

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