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घरेलू उद्योगों के लिए मौके खोलेगा कमजोर रुपया

Tue, 11 Jun 2013 09:50 PM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
नई दिल्ली/ब्यूरो Updated Tue, 11 Jun 2013 09:50 PM IST
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weak rupee will reveal opportunity for domestic industries

रुपये की कमजोरी कुछ घरेलू उद्योगों के लिए बड़ी राहत बन सकती है। डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत गिरने से वस्तुओं का आयात महंगा साबित होगा, जिससे घरेलू उद्योगों के लिए मौके खुलेंगे।

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फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (फिओ) के महानिदेशक अजय सहाय का कहना है कि रुपये में कमजोरी से ऑटो कंपोनेंट, प्लास्टिक, इलेक्ट्रॉनिक्स, बल्क ड्रग्स आदि से जुड़े घरेलू उत्पादों की मांग बढ़ सकती है। लेकिन इंपोर्टेड सामान खरीदना अब महंगा हो जाएगा।
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महंगे आयात के चलते पेट्रोलियम की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे महंगाई की आग और भड़केगी। गर्मियों में विदेश यात्रा का प्लान बना रहे लोगों को भी रुपये की कमजोरी का झटका लगेगा।
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रुपये की कमजोरी के बावजूद निर्यातकों के लिए कमाई की राह आसान नहीं है। सहाय का कहना है कि भारत के अलावा इंडोनेशिया और दक्षिणी अफ्रीका जैसे उभरते बाजारों की करेंसी में भी भारी गिरावट आई है।

इसके अलावा वैश्विक मांग की हालत भी सुधरती नहीं दिख रही है। इससे निर्यातकों पर डिस्काउंट देने का दबाव बढ़ गया है। फिर भी कुछ समय के लिए निर्यातक फायदे में जरूर रहेंगे।

देश का सालाना आयात, निर्यात के मुकाबले करीब 191 अरब डॉलर ज्यादा है। ऐसे में रुपये की कमजोरी चालू खाते के घाटे पर बड़ी चोट करेगी।

खासकर, कच्चे तेल के आयात के लिए सरकार को ज्यादा रुपये खर्च कर डॉलर खरीदने होंगे। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रघुराम राजन का कहना है कि रुपये पर दबाव कम करने के लिए तेल कंपनियां फॉरेन एक्सचेंज मार्केट से ज्यादा से ज्यादा खरीद डॉलर में करने पर सहमत हो गई हैं।

बढ़ेगी देसी संस्थानों की रौनक
रुपये की कमजोरी विदेशों से उच्च शिक्षा हासिल करने के सपने पर भारी पड़ सकती है। पिछले डेढ़ महीने के दौरान रुपये में करीब 10 फीसदी की गिरावट आई है। यानी, विदेशी शिक्षा करीब 10 फीसदी महंगी हो गई है। इसके अलावा, विदेश में रहने पर भी ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ेंगे।

रुपये और डॉलर के रिश्ते में आया यह बदलाव देसी विश्वविद्यालयों की रौनक बढ़ा सकता है। इतना ही नहीं उम्दा भारतीय संस्थानों में विदेशी छात्रों की तादाद भी बढ़ सकती है। डॉलर के मुकाबले रुपया जितना सस्ता होगा, यहां की सेवाओं और उत्पादों के लिए अच्छा है।

उभरते बाजारों की चमक फीकी
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि रुपये में आई इस गिरावट को डॉलर की मजबूती और दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया व मैक्सिको जैसे उभरते बाजारों की मुद्राओं में आई गिरावट से जोड़कर देखा जाना चाहिए। वैश्विक स्तर पर उभरते बाजारों की चमक फीकी पड़ती दिख रही है।


एफडीएफसी बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री अभीक बरुआ का कहना है विदेशी निवेशक भारत के बांड मार्केट से हाथ खींच रहे हैं। रुपये की इस गिरावट से जूझना सरकार व आरबीआई के लिए बहुत मुश्किल होगा।

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