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दवा कंपनियों को एफडीए का कड़वा डोज

Tue, 24 Sep 2013 07:36 PM IST
एजेंसी/मुंबई
एजेंसी/मुंबई Updated Tue, 24 Sep 2013 07:36 PM IST
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usfda increases inspections of drug facilities in india

अमेरिकी स्वास्थ्य नियामक (एफडीए) की सख्त निगरानी भारतीय दवा कंपनियों के लिए कड़वा डोज साबित हो रही है।

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मौजूदा वर्ष में एफडीए की सबसे ज्यादा सख्ती भारतीय दवा कंपनियों पर ही दिख रही है और उसने दवा बनाने की प्रक्रिया और दवाओं की गुणवत्ता दोनों ही स्तर पर इन कंपनियों को आडे़ हाथों लिया।

एफडीए से मिले आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2013 में उसके जांच घेरे में आने वाली भारतीय कंपनियों के 19 संयंत्रों से अमेरिका में दवाओं का आयात रोक दिया गया।

इसमें रैनबक्सी के मोहाली संयंत्र, वॉकहार्ड और आरपीजी लाइफ साइंसेज के संयंत्रों पर हाल में लगी रोक भी शामिल है।

इस दौरान चीन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान, दक्षिण अफ्रीका और जर्मनी की कई दवा कंपनियों के संयंत्रों के खिलाफ भी एफडीए की ओर से इंपोर्ट अलर्ट जारी किया गया। हालांकि ब्रिटेन और इजरायल की दवा कंपनियां इससे अछूती रहीं।
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अमेरिका दुनिया में दवाओं का सबसे बड़ा बाजार है। वहां सबसे ज्यादा दवाओं का आयात भारत से ही होता है। इसकी वजह भारतीय कंपनियों की दवाओं के दाम अमेरिकी कंपनियों की दवाओं के मुकाबले काफी कम होना है।
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भारतीय कंपनियां ज्यादातर जेनेरिक दवाएं बेचती हैं, जो वहां स्थानीय स्तर पर बनाई जाने वाली दवाओं से सस्ती बिकती हैं। ऐसे में अमेरिकी दवा कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी पर असर पर पड़ता है।

दवा बाजार के जानकारों का कहना है कि संभवत: इसी कारण एफडीए की सख्ती भारतीय दवा कंपनियों पर लगातार बढ़ रही है।

हालांकि एफडीए का कहना है कि उसकी भारतीय दवा कंपनियों से कोई दुश्मनी नहीं है, वह तो बस दवाओं की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सख्त निगरानी रखता है।

हालांकि एफडीए के इस दावे के बावजूद एक हकीकत यह भी है कि अमेरिका के जेनेरिक दवा बाजार में भारतीय कंपनियों की बढ़ती पैठ से वहां की दवा कंपनियों को कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है।


ऐसे में भारतीय दवा कंपनियों पर एफडीए की बढ़ती सख्ती सवाल जरूर खड़े करती है।

एफडीए के इस रुख के बावजूद चीन के बाद भारत दुनिया में पहला देश है, जिसने एफडीए को अपने यहां कार्यालय खोलने की अनुमति दी है। साथ ही उसके निगरानी पर्यवेक्षकों को अपने दवा संयंत्रों के निरीक्षण की इजाजत भी भारत ने दे रखी है।

इसके कारण भी भारतीय दवा कंपनियां एफडीए की कड़ी निगरानी के दायरे में आ गई हैं।

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