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इन 7 फंडों को अपनाइए, रुपयों से भरेगी तिजोरी

Mon, 02 Jun 2014 08:20 AM IST
Updated Mon, 02 Jun 2014 08:20 AM IST
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लोकसभा चुनाव से महीनों पहले केंद्र में मजबूत सरकार के गठन के संकेतों ने जहां इक्विटी बाजार को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है, वहीं इसने आम निवेशकों को परंपरागत निवेश विकल्पों से हटकर बाजार से जुड़े निवेश विकल्पों में हाथ आजमाने को एक बार फिर से उत्साहित किया है।

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बेहतर रिटर्न की उम्मीद में निवेशक एक बार फिर इस ओर रुख कर रहे हैं, पर मन में कहीं न कहीं डर भी है कि कई महीनों से दिख रहा बाजार में तेजी का यह रुझान कहीं अचानक करवट बदल बैठा तो, लेने के देने न पड़ जाएं।
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इसका एक कारगर समाधान है इक्विटी में सीधे पैसा लगाने के बजाय म्यूचुअल फंडों के जरिए निवेश। म्यूचुअल फंडों के निवेश जिन्हें उलझाऊ और जोखिम भरा लगता है, वह सिस्टेमेटिक इनवेस्टमेंट प्लान यानी एसआईपी के जरिए निवेश करके इसे काफी सरल व सुरक्षित बना सकते हैं।
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निवेशक खुद चुनता है अपनी पसंद के स्टॉक

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सिस्टेमेटिक इनवेस्टमेंट प्लान यानी एसआईपी के जरिए निवेशक शेयर बाजार में सरल एवं सुरक्षित तौर पर निवेश कर सकते हैं। कई ब्रोकरेज हाउस इसकी सुविधाएं दे रहे हैं।

निवेशक का पैसा किस स्टॉक में लगाया जाएगा, इस बात का फैसला इसमें खुद निवेशक करता है। इसके लिए किसी ब्रोकरेज हाउस में निवेशक का एक डीमैट अकाउंट होना जरूरी है। इसमें एक निर्धारित तारीख को तय रकम से चुने गए शेयर खरीदे जाते हैं।

निवेशक को किस शेयर या ईटीएफ में निवेश करना है, उसे इस बात की जानकारी होनी चाहिए। निवेशक कुछ चुनिंदा शेयरों को अलग करके स्टॉक्स बकेट बनाता है। निवेशक जिस बकेट में जितनी रकम आवंटित करेगा, उसमें उतनी रकम का निवेश एक तय तारीख को हो जाया करेगा।

निवेश की रकम व तिथि होती है निर्धारित

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निवेशक एसआईपी के लिए कोई भी ट्रिगर तारीख चुन सकता है। इस तरह किस्त की हर तारीख पर उतनी रकम का निवेश हो जाएगा। निवेशक इसमें यह तय कर सकता है कि किस शेयर में वह कितनी रकम लगाएगा।

आमतौर पर ब्रोकर न्यूनतम निवेश की एक सीमा तय कर देते हैं। हर दिन, साप्ताहिक, पखवाड़े या महीने में एक बार निवेश करना है, इस बात का फैसला निवेशक खुद कर सकता है।

जब ऑर्डर प्लेस किए जाते हैं, तो ब्रोकरेज फीस लगती है। डीमैट चार्ज भी सामान्य तरीके से लागू होते हैं।

शेयरों में फेरबदल है संभव

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निवेशक इस बात का ध्यान रखें कि वह एसआईपी बकेट के शेयरों में फेरबदल किया जा सकता है। यह बदलाव अगले निवेश की पहले से तय तारीख तक के लिए रहेगा। शेयरों में सिस्टेमेटिक इनवेस्टमेंट से उनका औसत खरीद मूल्य कम करने में मदद मिलती है।

ज्वाइंट नहीं हो सकते नाबालिग के अकाउंट

नाबालिग के म्यूचुअल फंड या डीमैट अकाउंट की ज्वाइंट होल्डिंग नहीं हो सकती है। अगर ज्वाइंट होल्डर में एक एनआरआई बन जाता है, तो रिजर्व बैंक के निर्देशानुसार निवेश में विदेशी करेंसी के ही नियम लागू होंगे।

यदि यह निवेश विदेशी मुद्रा में है तो इसकी ज्वाइंट होल्डिंग की इजाजत नहीं है। यदि फर्स्ट होल्डर की मृत्यु हो जाती है तो दूसरा होल्डर, उसके मृत्यु प्रमाण-पत्र के आधार पर प्राइमरी होल्डर बन जाता है।

डिविडेंड यील्ड फंड : निवेश का आकर्षक विकल्प

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म्यूचुअल फंड कंपनियां निवेश के लिए कई तरह के विकल्प उपलब्ध कराती हैं, लेकिन कुछ ऐसे निवेश विकल्प भी हैं जो निवेशकों के बीच लोकप्रिय हैं। इनमें एक डिविडेंड यील्ड फंड हैं। इन फंड की मूल प्रकृति एक इक्विटी ओरिएंटेड फंड की है क्योंकि इसके पोर्टफोलियो में इक्विटी होल्डिंग्स होती है।

हालांकि, इसमें शेयर के चुनाव की पूरी प्रक्रिया के लिए अलग तरीके का इस्तेमाल किया जाता है। आमतौर पर निवेश के मद्देनजर एक दिशानिर्देश जारी किया जाता है, जो फोर्टफोलियो बनाते समय फंड मैनेजर को दिशानिर्देश देता है। डिविडेंड यील्ड फंड्स के तहत पोर्टफोलियो में ऐसा स्टॉक होता है जो ऊंचा डिविडेंड (अधिक लाभांश) प्रदान करता है।

निवेशक को दो तरह से मिलता है फायदा

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डिविडेंड यील्ड स्टॉक के चुनाव के पीछे जो सिद्धांत काम करता है, वह यह कि ऐसे स्टॉक दो क्षेत्रों में फायदा पहुंचाते हैं। पहला, इन कंपनियों के पास मजबूत कैश फ्लो होता है इसलिए ये अपने शेयरधारकों को नियमित तौर पर डिविडेंड प्रदान करने में सक्षम होती हैं।

इस रूट के जरिए मुनाफा (यील्ड) आमतौर पर ज्यादा होता है। इसके अलावा, इस तरीके से डिविडेंड की प्राप्ति बुरे समय में भी एक आर्थिक संबल देती है।

इसलिए यह स्टॉक किसी समय विशेष के लिए भी कारगर साबित होते हैं। इतना ही नहीं शेयर की कीमतों में बढ़ोतरी का फायदा भी निवेशकों को मिलता है और यह आय का दूसरा जरिया बनता है।

कैसे करें स्टॉक का चुनाव

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पोर्टफोलियो के लिए ऐसे स्टॉक का चुनाव करना आसान काम नहीं है। ऐसी परिस्थितियां भी आ सकती हैं जहां आपके पसंद का स्टॉक उपलब्ध ही न हो। जब कभी शेयर की कीमतों में बढ़ोतरी होगी तो डिविडेंड यील्ड में कमी आएगी।

ऐसा इसके गणना के तरीकों की वजह से होता है। जाहिर तौर पर इससे पोर्टफोलियो में इस्तेमाल हो सकने वाले स्टॉक की संख्या में भी कमी होगी। इन परिस्थितियों में निवेशकों को दो बातों की जांच करनी चाहिए। पहला, उन मानदंडों की पड़ताल करें जो स्टॉक के चुनाव के उद्देश्यों के लिए तैयार किए गए हैं।

दूसरा, जिस तरीके से फंड मैनेजर पूरे पोर्टफोलियो को तैयार करता है, इसकी जांच अवश्य कर लेनी चाहिए। यह दोनों ही कारक फंड के पोर्टफोलियो की रूपरेखा के लिए काफी अहम हैं।

कंपनी का प्रदर्शन प्रभावित करता है डिविडेंड

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यदि कंपनी का प्रदर्शन खराब होता है तो यह आने वाले वर्षों में निवेशकों को मिलने वाले डिविडेंड को प्रभावित करता है। स्टॉक की कीमत गिरने से ऊंची डिविडेंड यील्ड की संभावना बनती है लेकिन लंबी अवधि के लिए यह अच्छी खबर नहीं है, क्योंकि अगली पेमेंट अवधि में डिविडेंड में भी गिरावट हो सकती है।

हालांकि, यह काफी विपरीत हालातों में ही होता है। यह एक ऐसी परिस्थिति होती है जिसमें निवेशक ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकते। लेकिन, इन हालातों से सामंजस्य बैठाने एवं अपनी योजना बनाते समय पूर्व के वर्षों में अदा किए गए डिविडेंड की निरंतरता पर नजर रखी जा सकती है। इस दौरान पिछले कुछेक वर्षों के डिविडेंड के आंकड़ों पर बारीकी से नजर दौड़ा लेनी चाहिए।

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