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अनचाहे कॉल, एसएमएस पर पाबंदी नाकाम

Sun, 07 Apr 2013 10:56 PM IST
धीरज कनोजिया/नई दिल्ली
धीरज कनोजिया/नई दिल्ली Updated Sun, 07 Apr 2013 10:56 PM IST
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unwanted calls and sms

अनचाहे टेलीमार्केटिंग कॉल और एसएमएस पर पाबंदी नाकाम साबित हो रही है।

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भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण यानी ट्राई की ओर से रोक के बावजूद निजी नंबरों से फोन कर उत्पाद बेचने का खेल जारी है।

ट्राई ने हजारों कनेक्शन काटे हैं, लेकिन इसका कोई नतीजा देखने को नहीं मिल रहा है। टेलीमार्केटिंग से जुड़े कई लोगों ने ग्राहकों को परेशान करने के लिए नए नए तरीके ईजाद कर लिए हैं और ऐसे लोगों को पकड़ना सरकार के बूते के बाहर की बात हो गई है।

ट्राई के मुताबिक 27 सितंबर 2011 को टेलीकॉम कामर्शियल कम्युनिकेशन कस्टमर प्रीफरेंस रेगुलेशन लागू होने के बाद ट्राई की कोशिश बेकार हो गई।

टेलीकॉम विशेषज्ञ महेश उप्पल कहते है कि टेलीमार्केटिंग एसएमएस और फोन कॉल से ग्राहकों की दिक्कत पहले से कुछ कम हुई है, लेकिन परेशानी पूरी तरह खत्म होती नजर नहीं आ रही है।
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ट्राई के तहत रजिस्टर्ड टेलीमाकेर्टिंग कंपनी निंबस आईटी सॉल्यूशन्स के निदेशक मनप्रीत कुमार कहते हैं कि छोटे स्तर पर एसएमएस और कॉल्स भेजने से बड़ी कंपनियों के कारोबार को नुकसान हो रहा है।
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मनप्रीत कहते है कि कई लोग दस बारह सिम खरीद लेते हैं। अभी एक दिन में 100 एसएमएस भेजने की सीमा है। ऐसे में यह लोग रोजना 15 से 20 सिम से लगभग डेढ़ से दो हजार एसएमएस भेजे देते है और कई बार कॉल भी करते हैं।

यही नहीं रजिस्टर्ड मार्केटिंग कंपनियां 24 पैसे प्रति एसएमएस लेती है, जबकि छोटे स्तर पर सक्रिय ये लोग सिर्फ 12 पैसे में यह काम कर देते है। ऐसे में ज्यादातर कारोबारी अपने प्रचार के लिए इन लोगों के पास जाते हैं। वहीं, उप्पल कहते हैं कि छोटे स्तर पर सक्रिय लोगों को फ्लाई बाय नाइट कहा जाता है।

यानी कोई व्यक्ति किसी को भी पांच सौ या एक हजार रुपये देता है और कुछ पांच सौ एसएमएस या फिर कॉल करने के लिए कहता है। इस किस्म के अनचाहे कॉल और एसएमएस पर नियंत्रण करना आसान नहीं। ये छोटे प्लेयर रजिस्टर्ड लोग नहीं हैं।

एक बड़ा कारण यह भी है कि विदेश में लोग अपने मोबाइल नंबर गिने चुने लोगों को ही देते है। वे घरेलू इस्तेमाल और व्यापार के लिए अलग फोन रखते है। मगर भारत में ऐसा नहीं है।


यहां एक ही फोन का इस्तेमाल करने को लेकर फोन नंबर टेलीमार्केटिंग कंपनियों के पास पहुंच जाता है। कई छोटी कंपनियां बाकायदा फोन नंबरों का डाटा बैंक बनाने का काम भी करती हैं।

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