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अनाज खरीद की प्रणाली में व्यापक बदलाव की तैयारी
नई दिल्ली/सुजय मेहदूदिया
Updated Mon, 03 Nov 2014 07:21 PM IST
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केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के तहत खुले बाजार से अनाज की खरीद के तहत गरीबों तक खाद्यान्न की आपूर्ति और खरीद की व्यवस्था में मौजूद खामियों को दूर करने की तैयारी कर रही है। इसके अलावा मौजूदा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में भी व्यापक बदलाव किया जा सकता है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और केंद्र सरकार द्वारा फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) के पुनर्गठन को लेकर गठित उच्च स्तरीय समिति (एचएलसी) के अध्यक्ष शांता कुमार ने इस बात के स्पष्ट संकेत दिए हैं।
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कुमार ने अमर उजाला के साथ खास बातचीत में बताया कि एफसीआई के पुनर्गठन को लेकर विभिन्न पक्षों के साथ चर्चा की गई है, पर अभी तक कुछ भी तय नहीं किया जा सका है। उन्होंने कहा कि समिति राज्य सरकारों और मामले से जुड़े विभिन्न पक्षों के साथ इस महीने कुछ और बैठकें करने के बाद दिसंबर के अंत तक केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप देगी।
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शांता कुमार के अलावा इस समिति में पंजाब और छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव, आईआईएम, अहमदाबाद के प्रोफेसर जी रघुराम, कृषि लागत एवं मूल्य निर्धारण आयोगी के पूर्व अध्यक्ष डा. अशोक गुलाटी, हैदराबाद विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के संकाय अध्यक्ष प्रोफेसर गुणमणि ननचरइया और एफसीआई के सीएमडी शामिल हैं।
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शांता कुमार ने कहा कि एफसीआई जैसी सरकारी एजेंसी के जरिए अनाज की खरीद की व्यवस्था अक्षम होने के साथ-साथ पक्षपात पूर्ण और भ्रष्ट थी। इससे केवल धनवान किसानों को लाभ था, जबकि गरीब व छोटे किसानों को इसमें दलालों के रहमो करम पर छोड़ दिया गया था।
उन्होंने कहा कि हम विभिन्न एजेंसियों और प्रणालियों के जरिए उपभोक्ताओं और किसानों की मदद के लिए करीब 2 लाख करोड़ रुपये खर्च करते हैं। देश में खाद्य सब्सिडी 1.25 लाख करोड़ रुपये और उर्वरक सब्सिडी पर 72,000 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इसके बावजूद योजना आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक 40 से 45 फीसदी तक अनाज लक्षित लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
एमएसपी प्रणाली के तहत केवल 15 फीसदी अनाज की खरीद ही हो पाती थी, वह भी केवल अमीर किसानों से। इस प्रणाली में अनाज उपजाने वाले करीब 85 फीसदी गरीब और सीमांत किसानों को खरीद की प्रक्रिया से बाहर रखा गया था। इन्हें अपना अनाज बेचने के लिए दलालों के चक्कर काटने पड़ते थे। अनाज खरीद की इस भ्रष्ट इस व्यवस्था के चलते हजारों गरीब व छोटे किसान सूदखोरों के चक्कर में फंस कर आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे थे।
शांताकुमार ने कहा कि अनाज खरीद की पक्षपात भरी इस व्यवस्था को खत्म करके यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए सौ फीसदी अनाज उसके हकदार लोगों तक पहुंच सके। किसान हो या आम उपभोक्ता उसे वह चीज मिलनी ही चाहिए, जो सरकार द्वारा उसे भेजी जा रही है। उन्होंने कहा एफसीआई और उसके जरिए चली आ रही इस गड़बड़ी भरी व्यवस्था को खत्म करना एक मुश्किल काम है और इसे पूरा कर पाना एक चुनौती भरा काम है।
हाल ही में पूर्वोत्तर के राज्यों के साथ इस संबंध में विचार-विमर्श करके लौटे शांता कुमार ने बताया कि अनाज की खरीद के लिए एक ऐसी सक्षम, बेहतर और त्वरित प्रणाली तैयार करने के लिए संबंधित पक्षों और लोगों से सुझाव आमंत्रित किए गए हैं, जो उपभोक्तओं और किसानों दोनों के ही लिए लाभकारी हो।
उन्होंने संकेत दिया कि अनाज खरीद प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों के लिए कुछ विशेष प्रावधान किए जा सकते हैं। इन राज्यों को यह सहूलियत इनकी दुर्गम पहुंच और यातायात संबंधी परेशानियों जैसी समस्याओं के समाधान के लिए दी जा सकती हैं।
अनाज के भंडारण की समस्या का जिक्र करते हुए शांता कुमार ने कहा कि नई प्रणाली में इसपर खासतौर पर ध्यान दिया जाएगा। मौजूदा प्रणाली में ज्यादातर खरीद और भंडारण एफसीआई और केंद्रीय भंडारण निगम (सीडब्ल्यूसी) द्वारा किया जा रहा है। राज्यों में अनाज का भंडार राज्य भंडार निगमों द्वारा किया जाता है। इस तरह भंडारण का काम में तीन-तीन एजेंसियों के जिम्मे होने के चलते समस्याएं उत्पन्न हो रही थीं। नई प्रणाली में इस बात का ध्यान रखा जाएगा कि भंडारण का काम पूरी तरह से किसी एक ही एजेंसी के पास हो, ताकि इसका बेहतर प्रबंधन किया जा सके।