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आर्थिक सुधारों में सरकार को लानी होगी तेजी

Mon, 03 Nov 2014 08:52 AM IST
नई दिल्ली/सुजय मेहदूदिया
नई दिल्ली/सुजय मेहदूदिया Updated Mon, 03 Nov 2014 08:52 AM IST
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Time For Narendra Modi Government to Walk the Talk on economic reforms to lift up the manufacturing sector

नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के तहत मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को तेजी दिए जाने के प्रयास के बावजूद देश के आठ मूलभूत उद्योगों (कोर सेक्टर) की विकास दर गिरकर 1.9 फीसदी के स्तर पर आना गंभीर चिंता का विषय है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर अभी काफी आर्थिक और प्रशासनिक सुधार किए जाने की जरूरत है। इसके अलावा इन सेक्टरों के नियमन और नियंत्रण पर भी नए सिरे से विचार करने की जरूरत है, ताकि देशी-विदेशी निवेशकों की ओर से इन सेक्टरों में निवेश की राह में आड़े आ रही बाधाओं को दूर किया जा सके।

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सरकार की ओर से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक सितंबर माह में आठ कोर सेक्टरों की विकास दर 1.9 फीसदी पर रही। पिछले साल सितंबर में यह 9 फीसदी के स्तर पर थी और अगर मासिक आधार पर तुलना करें, तो अगस्त 2014 का आंकड़ा 5.8 फीसदी पर था। गौर करने वाली बात यह है कि यह आठ आंकड़ा कोयला, कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, पेट्रोलियम, उर्वरक, स्टील, सीमेंट और बिजली जैसे महत्वपूर्ण सेक्टरों के प्रदर्शन को दर्शाता है, जिनका देश की औद्योगिक विकास दर (आईआईपी) में करीब 38 फीसदी का योगदान है।
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सत्ता में आने के छह माह बीतने के बाद मोदी सरकार के लिए अब यह समय बड़े सुधार करने का है। कोयला और पेट्रोलियम सेक्टर में सरकार की ओर से हाल में उठाए गए बड़े कदमों को मौजूदा सरकार के सुधार के तौर पर इसलिए नहीं देखा जा सकता, क्योंकि डीजल की कीमतों को नियंत्रण मुक्त करने का फैसला यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल में लिया गया था। इसी तरह कोयला क्षेत्र से जुड़ा कदम सुप्रीम कोर्ट द्वारा कोल ब्लॉकों का आवंटन रद्द किए जाने के मद्देनजर सरकार को उठाना पड़ा है। इसलिए सरकार के इन कदमों को छोड़कर देखा जाए, तो आर्थिक सुधार की प्रक्रिया उस गति से बढ़ती नहीं दिखाई देती, जिस हिसाब से उसे होना चाहिए था।
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हकीकत में देखें, तो मैन्यूफैक्चरिंग के काम में आज भी कंपनियों को इंस्पेक्टर राज व लाइसेंस राज जैसी स्थितियों से गुजरना पड़ाता है। उन्हें राज्यों के बीच कर संबंधी विवादों से लेकर केंद्र एवं राज्य के स्तर पर ढेरों मंजूरियों की जटिलताओं से भी दो-चार होना पड़ता है। इसके अलावा राजमार्गों की खस्ता हालत, सुविधाओं के लिहाज से अपर्याप्त रेलवे नेटवर्क, अधूरी पड़ी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं, वन-पर्यावरण संबंधी मंजूरियों में देरी और कर और श्रम विभाग के नियमों संबंधी जटिलताओं से भी जूझना पड़ता है। पुलिस और परिवहन विभाग द्वारा राज्यों और राजमार्गों पर की जाने वाली अवैध वसूली भी मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों के लिए बड़ा सिरदर्द है।

सारी चीजें मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की रफ्तार में सुस्ती और इस क्षेत्र में विदेशी निवेशकों के आने से कतराने के लिए जिम्मेदार हैं। देश की शीर्षस्थ कंपनियों के बाजार पूंजीकरण में पिछले पांच वर्षों के दौरान काफी अस्थिरता देखने को मिली है। इन कंपनियों का बाजार पूंजीकरण वर्ष 2010 में 52.16 फीसदी पर था, जो 2011 में लुढ़क कर 13.66 फीसदी पर और 2012 में इसके आधे से भी कम 5.20 फीसदी पर आ गया।


हालांकि अगले दो वर्षों में इसमें रिकवरी दिखी और 2013 में यह 13.14 फीसदी पर और इस साल 32.28 फीसदी तक आ गया है। इसी तरह का ट्रेेंड मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की कंपनियों की संख्या में भी देखने को मिलता है। टॉप 500 कंपनियों की लिस्ट वर्ष 2009 में घटकर 236 पर और 2013 में 202 पर आ गई, इस वर्ष यह कुछ सुधार के साथ 215 पर है। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में मैन्यूफैक्चरिंग का योगदान भी 2011-12 के 16.28 फीसदी से घटकर 2013-14 में 14.94 फीसदी पर आ गया। इस साल यह कहां ठहरता है, इसके लिए चालू वित्त वर्ष के खत्म होने पर आंकड़े आने का इंतजार करना होगा।

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