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सरकारी खरीद नीति के लिए खुद को करें तैयार

Fri, 12 Apr 2013 07:45 PM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
नई दिल्ली/ब्यूरो Updated Fri, 12 Apr 2013 07:45 PM IST
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small businesses should be ready for public procurement policy

सरकारी खरीद नीति यानी छोटे कारोबारियों को सरकार के विभागों द्वारा की गई खरीदारी में हिस्सा मिलना। इसके तहत केंद्र सरकार के विभागों द्वारा की गई कुल खरीदारी में 20 फीसदी हिस्सेदारी छोटे कारोबारियों के लिए तय की गई है।

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इस 20 फीसदी में से भी अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए 20 फीसदी की खरीदारी तय है। छोटे कारोबारियों के लिए सरकारी खरीद नीति अप्रैल 2012 से लागू है। पहले तीन साल यह कंपनियों के लिए ऐच्छिक है, जबकि इसके बाद यह विभागों और कंपनियों के लिए अनिवार्य होगी।
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अब, जबकि इस नीति को लागू हुए एक साल बीत चुका है, तो सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्रालय इसकी समीक्षा करने जा रहा है, जिसके तहत केंद्र सरकार के विभागों और कंपनियों के प्रमुखों के साथ बैठक भी होने वाली है।
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ऐसे में यह बहुत जरूरी है कि छोटे कारोबारी भी न केवल अपनी बातों को सरकार के पास रखें, बल्कि सरकार द्वारा जारी किए गए दिशा निर्देशों का पालन करें, जिससे कि उन्हें न केवल सरकारी खरीद का लाभ मिले, बल्कि उन्हें समय से भुगतान भी मिलता रहे।

किन बातों का रखें ध्यान
सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्रालय ने छोटे कारोबारियों के लिए एडवाइजरी जारी की है, जिसके तहत यह उल्लेख किया गया है कि कारोबारी किन कदमों को उठाकर बेहतर तरीके से मंत्रालय की योजनाओं का लाभ उठा सकते हैं। मंत्रालय के अनुसार कारोबारी अपने ऑर्डर बुक पर जरूर जिला औद्योगिक केंद्र द्वारा मिले पंजीकरण नंबर का उल्लेख करें।

इस नंबर के जरिए यह बात आसानी से पता की जा सकेगी, कि कंपनियों और विभागों द्वारा कितने छोटे कारोबारियों से खरीदारी की गई है। यह बहुत जरूरी है कि सही जानकारी सामने आएं, जिससे छोटे कारोबारियों के लिए नीतियों का सही पालन हो सके।

कंपनियों की जरूरत के अनुसार खुद को करें विकसित
सरकारी खरीद नीति को पहले तीन साल की अवधि तक कंपनियों के लिए ऐच्छिक रखा गया है। ऐसा करने की बड़ी वजह कंपनियों की एक दलील है। कंपनियों का कहना है कि उन्हें बड़े पैमाने पर खरीद करने के साथ-साथ अपनी खास जरूरतों के लिए उत्पाद चाहिए, उस अनुपात में छोटे कारोबारी मिलना आसान नहीं है।


ऐसे में यह जरूरी है कि छोटे कारोबारी कंपनियों के साथ खुद या अपने संगठनों के जरिए बैठकर उनकी जरूरतों के मुताबिक उत्पाद बनाने की योजना तैयार करें। साथ ही उसके लिए मंत्रालय, सिडबी, एनएसआईसी की योजनाओं का फायदा उठाकर पूंजी की भी उपलब्धता बढ़ाएं।

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