इन चुनौतियों का मुकाबला कैसे करेंगे मोदी?
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लोकसभा चुनावों 2014 में पूर्ण बहुमत के साथ नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चमकने वाली भारतीय जनता पार्टी के सच में अच्छे दिन आ गए हैं।
भाजपा की जीत से लेकर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की शपथ लिए जाने तक शेयर बाजार से लेकर रुपए तक में काफी उछाल आया है। वहीं कॉरपोरेट जगत इस जीत से सच में बहुत खुश है।
पर मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का विरोध भारतीय जनता पार्टी पहले ही कर चुकी है। ऐसे में विदेशी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के अन्य रास्ते देखे जाएंगे।
क्या मोदी रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को हरी झंडी देंगे? रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर पहले ही लॉबिंग शुरू हो गई है। ऐसे में सवाल यह होगा कि रक्षा क्षेत्र में कितना विदेशी निवेश बढ़ाया जाएगा? अगर रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश बढ़ाया जाता है तो इसकी प्रमुख वजह क्या होगी?
क्या रक्षा क्षेत्र में सच में इतनी बड़ी मात्रा में विदेशी निवेश की जरूरत है? रक्षा क्षेत्र में एफडीआई को बढ़ा कर 74 फीसदी करने की मांग की गई है।
रेलवे का निजीकरण?
बहुत समय से रेलवे के निजीकरण को लेकर गाहे-बगाहे मांग उठती है। रेलवे के निजीकरण के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारने का तर्क दिया जाता है। अभी देश भर में सार्वजानिक-निजी भागीदारी(पीपीपी) पर काम शुरू हो चुका है।
पर अभी भी निजीकरण नहीं हो सका है। रेलवे के पूर्व रेल मंत्री नीतिश कुमार भी रेलवे के निजीकरण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर चुके हैं। नीतिश के मुताबिक, 'रेलवे भारतीय एकता की पहचान है। इसका निजीकरण नहीं होना चाहिए।'
वहीं पूर्व रेल मंत्री पवन बसंल ने निजीकरण को लेकर तो अपनी इंकार कर दिया था। पर रेलवे में पीपीपी मोड पर काम को लेकर हामी भरी थी।
क्या मोदी अपनी पूर्ण बहुमत वाली सरकार में रेलवे में निजीकरण को हरी झंडी दिखा देंगे? अगर मोदी ऐसा करते हैं। तो बेशक भारत का उद्योग जगत इसका स्वागत करेगा। पर बड़े व्यापक पैमाने पर इसके विरोध के लिए भी मोदी को तैयार रहना होगा।
रियल एस्टेट बिल का क्या करेंगे मोदी?
हर दिन लोगों के घर का सपना टूटता जा रहा है। घरों की कीमत इतनी तेजी से बढ़ी है कि कुछ लोग ही घर खरीदने की हिम्मत जुटा पा रहे हैं।
दिल्ली-एनसीआर में अच्छी लोकेशन पर 2बीएचके फ्लैट की कीमत 40 लाख रुपए से ऊपर पहुंच गई है। क्या सच में दो कमरें के मकान की कीमत इतनी होनी चाहिए?
यूपीए-2 सरकार की कैबिनेट ने रियल एस्टेट रेग्युलेशन एंड डेवलपमेंट बिल 2013 को पास कर दिया है। इस बिल के संसद में पारित हो जाने के बाद घर पाने के हक के खिलाफ जनता सीधे बिल्डर से लड़ सकेगी।
साथ ही बिल्डर्स फिजूल खर्ची भी कम होगी। इस बिल में ऐसे कई प्रावधान है जिससे देश में लोगों का सस्ता घर समय पर ही उपलब्ध हो सकेगा। साथ ही समय पर घर न देने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का नियम है।
पर यह बिल अभी भी संसद में लंबित पड़ा हुआ है। क्या रियल एस्टेट मालिकों के दबाव में इस बिल को और अधिक दबाया जाएगा?
सुरक्षित नौकरी, युवाओं का सपना कैसे होगा पूरा?
देश के युवाओं का सबसे बड़ा सपना एक अच्छी नौकरी है। देश के मनोनीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युवाओं का बहुत सपने दिखाएं है। सब युवा अपने अच्छे दिन आने का राह तक रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए युवाओं के इस सपने को पूरा करना सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण होगा। क्योंकि वर्ष 2008-2014 के बीच देश के लाखों युवाओं की नौकरी गई है।
कभी इस आर्थिक संकट का नाम दिया गया तो कभी इसे निजी क्षेत्र की कंपनियों ने खर्चों में कमी के नाम पर युवाओं की नौकरी छीन ली। क्या मोदी निजी क्षेत्र और सार्वजानिक क्षेत्र लोगों के लिए सुरक्षित नौकरी की व्यवस्था कर पाएंगे?
क्या मोदी के आने से रुपया ऐसे ही मजूबत होता रहेगा?
विदेशी पूंजी की आवक में बढ़ोतरी और नई सरकार को लेकर बने सकारात्मक माहौल के कारण रुपया 11 माह के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है।
इस कारण रुपया एशिया प्रशांत क्षेत्र में साल 2014 में सबसे बेहतर मजबूती पाने वाला मुद्रा बन गया है। इस वर्ष की शुरुआत से रुपये में अब तक 5.3 फीसदी की मजबूती आ चुकी है।
मजबूती हासिल करने के मामले में इसने इंडोनेशियाई रुपये और न्यूजीलैंड के डॉलर को भी पीछे छोड़ दिया। रविवार को एक डॉलर के मुकाबले रुपया 58.43 के स्तर पर कारोबार कर रहा था। इस साल के शुरू में एक डॉलर की कीमत 61.8 रुपए थी, जिसने छह माह से कम समय में 327 पैसे की मजबूती हासिल की।
पिछले साल अगस्त में रुपया ऐतिहासिक निम्न स्तर 68.80 पर पहुंच गया था। आरबीआई के नए गवर्नर रघुराम राजन के आने के बाद इसमें काफी सुधार हुआ था।
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की खबर के बाद से ही लगातार बाजार में तेजी आ रही है। पर ये तेजी कब तक जारी रहेगी? इसका जवाब अभी किसी के पास नही हैं। क्या जब मोदी कॉरपोरेट जगत के खिलाफ कुछ निर्णय लेंगे, तभी बाजार ऐसे ही भागेगा। ये आने वाला समय बताएगा?
सरकारी बैंकों का होगा निजीकरण?
भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी हालिया रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया है। केंद्र सरकार को अपनी हिस्सेदारी को सरकारी बैंकों में घटाना चाहिए। यह रिपोर्ट सरकारी बैंकों के बढ़ते एनपीए को देखते हुए कही गई है।
पर इस बात का विरोध बैंक यूनियन ने शुरू कर दिया है। क्या सचमुच आने वाले समय में देश में सरकारी बैंकों की संख्या काफी कम हो जाएगी? बैंकों की इस खस्ता हालत के जिम्मेदार कौन लोग हैं?
देश में अभी 27 सरकारी बैंक है। ऐसे में सरकारी बैंकों के निजीकरण का रास्ता भी खोला जा सकता है। इससे पहले एक्सिस बैंक पूरी तरह से सरकार के स्वामित्व से निकलकर विदेशी कंपनी के हाथों में चला गया है।
वहीं भारतीय रिजर्व बैंक जल्द ही निजी कंपनियों को बैंक खोलने का लाइसेंस दे सकती है। चुनावों के चलते यह प्रक्रिया अभी अधर में पड़ी हुई थी। मोदी सरकार के सरकारी बैंकों को लेकर क्या निर्णय लिए जाते हैं? इस पर भी काफी लोगों की नजरें बनी रहेंगी।
कैसे कम होगा चालू खाता घाटा?
देश में चालू खाता घाटा को वित्त वर्ष 2014-15 के अंत 2.3 के स्तर पर लाना होगा। सिटीग्रुप अपनी एक रिपोर्ट में इस बात की संभावना भी जता चुका है।
चालू खाता घाटा को कम करने के लिए पूर्व वित्त मंत्री पी.चिदंबरम ने भी काफी कड़े कदम उठाए थे। इसका असर वित्त वर्ष 2013-14 के कर संग्रह पर देख कर लगाई जा सकती है।
साथ ही सर्विस टैक्स भरने वालो की संख्या में भी काफी संख्या में बढ़ोतरी हुई है। सोने की तस्करी पर लगाम कसी गई। इससे चालू खाते घाटे के अंतर को कम करने में सफलता मिली है।
पर यहीं से मोदी की परीक्षा शुरू होगी। चालू खाते घाटे के प्रमुख कारणों तेल और एलपीजी सिलेंडर पर दी जाने वाली सब्सिडी को कम करने का काम मोदी कर सकते हैं।
जनता की नाराजगी न झेलने पड़े, इसके लिए कोई वैकल्पिक रास्ते खोज सकते हैं। पर तेल और गैस की कमी की उपलब्धता दुनिया भर में कम होने की बात से वह नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। तेल और गैसों की कीमतों में बढ़ोतरी भी सरकार के लिए एक चिंता का विषय रहेगी। क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार के आधार पर तय होने वाले तेल की कीमतों में सरकार कुछ कर भी नहीं सकती है।