फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Business archives ›   saraswati devi female farmer of india set showcase in agriculture

आधुनिक खेती के दौर में आदर्श बन गई एक औरत

Mon, 16 Jun 2014 03:54 PM IST
Updated Mon, 16 Jun 2014 03:54 PM IST
विज्ञापन
saraswati devi female farmer of india set showcase in agriculture
उत्तर प्रदेश में महिला किसान भी किसी से कम नहीं। आधुनिक खेती हो या पशुपालन, वे अपना लोहा मनवा रही हैं। इन्हीं में से एक हैं लखनऊ जिले के गांव उदवत खेड़ा में रहने वाली सरस्वती देवी। सहफसली खेती करके उन्होंने न सिर्फ अपनी माली हालत सुधारी, बल्कि एक स्कूल चलाकर सैकड़ों बच्चों की जिंदगी भी संवार रही हैं। उनका काम जो भी देखता है, भूरि-भूरि प्रशंसा करने से खुद को नहीं रोक पाता।
विज्ञापन



तीन बच्चों की मां है विधवा सरस्वती
महज नौ बरस की उम्र में ब्याह दी गई सरस्वती देवी बालिग होने से पहले ही विधवा हो गई थीं। तब तक वह तीन बच्चों की मां बन चुकी थीं। पति की मौत से उन्हें गहरा सदमा पहुंचा, मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपनी पांच हेक्टेयर जमीन पर खुद ही गन्ने की खेती करने की ठानी।
विज्ञापन


शुरुआत में उन्हें उम्मीद के मुताबिक मुनाफा नहीं मिला। सरस्वती देवी को समझ आ गया कि आधुनिक ढंग से खेती किए बिना अच्छी पैदावार नहीं ली जा सकती। इसके लिए उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों से संपर्क किया, जहां से उन्हें सहफसली खेती करने का सुझाव मिला।
विज्ञापन
विज्ञापन


वैज्ञानिकों की सलाह पर अमल करते हुए सरस्वती देवी ने गन्ने की आधुनिक प्रजाति के साथ ही दलहन की खेती भी शुरू की। दो कतारों में गन्ने का बीज डालतीं तो तीसरी कतार दलहन या अन्य किस्म की फसलों के लिए छोड़ देतीं। यह तरीका काम कर गया।

सरस्वती बताती हैं कि दूसरे गन्ना किसानों की अपेक्षा वह अपनी जमीन से दोगुना लाभ अर्जित करने लगीं। जब भी कोई दिक्कत आई तो उन्होंने लखनऊ स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ शुगरकेन रिसर्च के वैज्ञानिकों की मदद भी ली।
अन्य किसानों के लिए वह सुझाव देती हैं कि गन्ने के साथ सहफसलीय तरीका अपनाना ज्यादा फायदेमंद साबित होता है, क्योंकि गन्ने की फसल को अन्य फसलों से नुकसान या बीमारियां लगने की संभावना कम रहती है। इससे ज्यादा पैदावार ली जा सकती है।


शिक्षा के प्रचार-प्रसार पर भी जोर
सरस्तवी देवी जब उदवत खेड़ा में ब्याह कर आई थीं, तो उन्हें अक्षर ज्ञान भर था। यहां ही उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की। फिर हाईस्कूल और इंटर किया। साथ ही उन्होंने संकल्प लिया कि वे ग्रामीण बच्चों को अनपढ़ नहीं रहने देंगी। इसलिए उन्होंने खेती से हुए मुनाफे के एक हिस्से का इस्तेमाल करते हुए एक स्कूल खोला। आज इस स्कूल में 350 बच्चे पढ़ रहे हैं। इनमें से करीब सौ बच्चे बेहद गरीब परिवारों से हैं, जिनसे कोई फीस नहीं ली जाती।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed