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हाथ से फिसला रुपया, बेबस सरकार
नई दिल्ली/ब्यूरो
Updated Thu, 22 Aug 2013 09:12 PM IST
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लगातार कमजोर होता रुपया केंद्र की यूपीए सरकार के लिए एक बड़ा सिरदर्द बनता जा है।
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सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा उठाए जा रहे कदमों से बेअसर रुपया बृहस्पतिवार को 65.56 रुपये प्रति डॉलर के रिकार्ड निचले स्तर तक पहुंचने के बाद पिछले कारोबारी सत्र के मुकाबले 44 पैसे गिरकर 64.55 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ।
वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने रिजर्व बैंक के गवर्नर और मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बैठक कर जो मशक्कत की उसका कोई असर मुद्रा बाजार पर नहीं दिख रहा है।
भले ही शाम को एक संवाददाता सम्मेलन में वित्त मंत्री ने किसी तरह की चिंताजनक स्थिति से इंकार किया हो लेकिन जिस तरह से वह लगातार बैठकें कर रहे हैं उससे सरकार की चिंता साफ झलक रही है।
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जिस तरह से रुपया गिर रहा है और रिजर्व बैंक द्वारा उठाए गए मौद्रिक कदमों के चलते बैंकों ने ब्याज दरें बढ़ाना शुरू किया है उससे यूपीए सरकार को इसके राजनीतिक खामियाजे की चिंता भी सताने लगी है।
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देर सबेर पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी सरकार की मजबूरी बन जाएगी। वहीं कुछ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान रुपये के 70 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगा रहे हैं।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार द्वारा अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाने से नतीजे सामने नहीं आ रहे हैं।
बृहस्पतिवार को भी वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था में जल्दी सुधार होने और चालू खाता घाटा के 70 अरब डॉलर पर रहने की बात कहकर सांत्वना देने की कोशिश की लेकिन कोई बड़ा कदम उठाने से परहेज बरता।
वहीं रिजर्व बैंक गवर्नर ने ढांचागत बदलाव करने की जरूरत पर जोर दिया जिसमें बचत को प्रोत्साहन देना प्रमुख है।
अप्रैल से अगस्त के पहले सप्ताह तक देश का विदेशी मुद्रा भंडार 14 अरब डॉलर घट चुका है। वहीं शार्ट टर्म कर्ज जैसे भुगतान के लिए साल भर में करीब 170 अरब डॉलर की जरूरत है।
ऐसे में बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सरकार एनआरआई बांड या सॉवरेन बांड जैसे कदमों के जरिये करीब 20 अरब डॉलर जुटाने की कवायद नहीं करती तब तक मौजूदा कदमों से रुपये में स्थिरता की संभावना काफी कम है। इसके पहले सरकार 2001 में एनआरआई बांड के जरिये डॉलर जुटा चुकी है।
रुपया कमजोर होने का क्या होगा असर--
आम आदमी परः-
जरूरी सामानों की कीमतें बढ़ेंगी।
तेल का आयात महंगा होगा।
महंगे पेट्रोल-डीजल से सफर का बजट बढ़ेगा।
महंगे डॉलर से विदेश यात्रा के लिए ज्यादा रुपयों की जरूरत।
विदेशी में पढ़ाई पर भी ज्यादा खर्च करना होगा।
सरकार परः-
परेशानी से घिरी अर्थव्यवस्था की मुश्किलें और बढ़ीं।
इकोनॉमी को पटरी पर लाने की कोशिश में अड़चन।
कमजोर रुपये से महंगाई को हवा मिलने की आशंका।
बढ़ती महंगाई वोटरों को करेगी नाराज।
लगातार कोशिश के बावजूद थम नहीं रही रुपये में गिरावट।
अर्थव्यवस्था परः-
आर्थिक विकास दर, दस साल के निचले स्तर पर।
औद्योगिक उत्पादन में गिरावट से विकास दर को झटका।
कमजोर रुपया और चालू खाते का बढ़ता घाटा बड़ा सिरदर्द।
क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की ओर से भारत की निवेश रेटिंग घटाने का डर।