फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Business archives ›   restriction of mango in european country

अलफांसो आम पर प्रतिबंध से होगा 100 करोड़ का घाटा

Thu, 01 May 2014 03:12 PM IST
Updated Thu, 01 May 2014 03:12 PM IST
विज्ञापन
restriction of mango in european country

हापुस आमों का व्यापार मुख्यत: नवी मुंबई के वाशी स्थित कृषि उत्पाद बाजार समिति में होता है। बुधवार से ही बाज़ार के अंदर तथा बाहर कोंकण से आए हापुस आमों से लदे ट्रकों की लंबी कतारें लगी हैं।

विज्ञापन


व्यापारी और किसान ट्रकों से आम उतरवाने में लगे हैं। जैसे-जैसे गरमी बढ़ रही है, वैसे-वैसे उत्पादकों के बीच आम की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ रही है। हर किसान जल्द से जल्द अपना माल बेचने की कोशिश में है। इधर कर्नाटक के किसान भी अपनी फसल लेकर यहां पहुंच रहे हैं।
विज्ञापन


पाबंदी के बाद स्थानीय बाज़ारों में फलों के राजा की कीमत अचानक से गिर हो गई है। अनुमान के मुताबिक़ किसान और निर्यातकों को चंद दिनों के भीतर ही करीब 100 करोड़ रुपये का नुक़सान उठाना पड़ा है।
विज्ञापन
विज्ञापन

मध्य पूर्व में भी घटी मांग

restriction of mango in european country

ब्रिटेन के कृषि और पर्यावरण मंत्रालय डेफरा के प्रवक्ता ने बताया कि "यह अस्थाई प्रतिबंध हमारे यहां उगाई जाने वाली सलाद की फ़सल की सुरक्षा के लिए हैं. यह उद्योग 32.10 करोड़ पौंड (करीब 32.61 अरब रुपये) का है।

भारत एक व्यापारिक सहयोगी है और ये अस्थाई प्रतिबंध उनके साथ होने वाले सफ़ल व्यापार का एक मामूली हिस्सा भर है। हम भारत और अपने यूरोपीय प्रतिपक्षियों के साथ मिलकर इस मुद्दे को सुलझाने और इन चुनिंदा उत्पादों का व्यापार जल्द से जल्द शुरू करने के लिए काम कर रहे हैं।"

आम के साथ चार सब्ज़ियों- बैंगन, करेला, चचिंडा और अरबी के निर्यात पर भी यूरोपीय संघ ने प्रतिबंध लगाया है। यह निर्णय 1 मई यानी गुरुवार से लागू हो रहा है और 31 दिसंबर 2015 तक जारी रहेगा।

नवी मुंबई कृषि उत्पाद बाज़ार समिति के संचालक तथा आम व्यापारी संजय पानसरे ने कहा, "आम उत्पादक किसान पहले से ही कई संकटों का सामना कर रहा है. इस साल तापमान में अचानक हुई वृद्धि से फल पेड़ पर ही पकने लगे तो किसानों ने सारे के सारे फल यहां भेज दिए। जिसके कारण कीमतें बुरी तरह गिर गईं. पिछले दो दिन में ही आम से लदे हज़ार ट्रक बाज़ार पहुंचे हैं।"

पानसरे कहते हैं कि मुंबई कृषि उत्पाद बाज़ार समिति से हर साल करीब 100 करोड़ रुपये का आम यूरोपीय देशों को निर्यात होता है, "लेकिन इस साल यह माल निर्यात नहीं हो सकेगा और हमें काफी नुक़सान उठाना पड़ेगा।"

यूरोपीय संघ के प्रतिबंध के बाद व्यापारियों ने दुबई पर ध्यान केंद्रित किया था. लेकिन वहां भी निराशा ही हाथ लग रही। यूरोपीय संघ के प्रतिबंद के बाद करीब 40 फ़ीसदी हापुस आम अब दुबई तथा अन्य मध्य एशियाई देशों को जा रहा है।

प्रतिबंध सभी आमों पर

restriction of mango in european country

ब्रिटेन के कृषि और पर्यावरण मंत्रालय- डेफ़रा का कहना है कि आमों पर 'प्रतिबंध' को लेकर भ्रम है, जिसे स्पष्ट करते हुए उसने कहा है।

पूरे यूरोपीय यूनियन में लागू होने वाले अस्थाई प्रतिबंध भारत से आने वाले वनस्पति उत्पादों पर लागू होते हैं जिनमें सभी आम (सिर्फ़ अल्फ़ांसो नहीं) शामिल हैं। इसके अलावा बैंगन, चचिंडा, करेला, अरबी के पत्ते भी इस सूची में हैं।

यह प्रतिबंध शुरू में 2015 तक के लिए हैं. लेकिन यूरोपीय यूनियन लगातार स्थिति पर नज़र रखेगा और अगर स्थिति सुधरती है तो वह प्रतिबंध उठा भी सकता है। पानसरे कहते हैं, "दुबई तथा मध्य पूर्व के अन्य देशों में हापुस आम का 4,000 टन का सालाना व्यापार है। लेकिन इस साल वहां भी हापुस की मांग में काफी कमी आई है।"

यूरोपीय आयातकों की मांग के अनुसार महाराष्ट्र के कई व्यापारियों ने निर्यात के पहले हापुस आमों को हॉट वाटर तथा वेपर ट्रीटमेंट दिया है।

हापुस आम के एक और व्यापारी मोहन डोंगरे ने कहा, "अप्रैल के महीने में करीब 80 हजार दर्जन हापुस आम यूरोप के अलग-अलग देशों में निर्यात हो चुके हैं और अब तक एक भी शिकायत नहीं आई है। अगर अब तक निर्यात किए गए फलों की गुणवत्ता को लेकर कोई शिकायत नहीं है तो आगे भी हमें निर्यात करने दिया जाए. अगर कोई शिकायत आती है तो कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।"

उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व के अलावा सिंगापुर में भी हापुस की ख़ासी मांग है। लेकिन यूरोपीय संघ के अधिकारी मार्क इंग्लिश का कहना है कि 2013 में भारतीय आम और कुछ सब्ज़ियों की 207 खेप में ऐसे कीड़े पाए गए जो यूरोप में नहीं पाए जाते हैं। इसी के बाद यूरोपीय आयोग ने प्रस्ताव रखा कि भारत से निर्यात होने वाले पाँच फलों और सब्ज़ियों पर अस्थाई रोक लगा दी जाए।

मार्क इंग्लिश कहते हैं कि ख़तरा ये है कि इन उत्पादों में पाए गए कीड़ों से यूरोप में कृषि को खतरा हो सकता है जैसे कि ग़ैर यूरीपोय फ़्रूट फ्लाई. भारत ने कहा है कि वो इस दिशा में कदम उठाएगा। ईयू के फ़ूड एंड वेटनरी ऑफ़िस के अधिकारी 2014 के आख़िर में जाँच करेंगे कि भारत ने उचित कदम उठाए हैं या नहीं। इसी जाँच के बाद तय किया जाएगा कि पाबंदी हटाई जानी चाहिए या नहीं।

मौसम के अनुकूल हों मानक

restriction of mango in european country

मुंबई अपेडा के प्रमुख डॉ सुधांशू ने कहा, "यूरोपीय यूनियन ने फरवरी के तीसरे सप्ताह में ही यह घोषणा कर दी थी कि एक मई से निर्यात पर पाबंदी लागू हो जाएगी. अप्रैल महीने तक निर्यात पर पाबंदी नहीं थी। फलों तथा सब्ज़ियों पर पाए जानेवाले परजीवी और अन्य कीडों की वजह से यह पाबंदी लगाई गई है।"

मार्क इंग्लिश, यूरोपीय संघ ने बताया कि, "2013 में भारतीय आम और कुछ सब्ज़ियों की 207 खेप में ऐसे कीड़े पाए गए जो यूरोप में नहीं पाए जाते हैं। इसी के बाद यूरोपीय आयोग ने प्रस्ताव रखा कि भारत से निर्यात होने वाले पाँच फलों और सब्ज़ियों पर अस्थाई रोक लगा दी जाए। खतरा ये है कि इन उत्पादों में पाए गए कीड़ों से यूरोप में कृषि को खतरा हो सकता है जैसे कि ग़ैर यूरीपोय फ़्रूट फ्लाई। भारत ने कहा है कि वह इस दिशा में कदम उठाएगा। ईयू के फ़ूड एंड वेटनरी ऑफ़िस के अधिकारी 2014 के आख़िर में जाँच करेंगे कि भारत ने उचित कदम उठाए हैं या नहीं। इसी जाँच के बाद तय किया जाएगा कि पाबंदी हटाई जानी चाहिए या नहीं।"

"यूरोप के प्रशासकों को लगता है कि इन कीड़ों और कीट जैसे परजीवियों की वजह से वहां की खेती, विशेष रूप से ककडी तथा टमाटर की फसल पर प्रभावित हो सकती है। भारत सरकार का एक शिष्टमंडल यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों से मिलकर आया है। पाबंदी हटाने के लिए प्रयास भी जारी हैं।"

बदलते मौसम में कीड़ो की मार

restriction of mango in european country

हालांकि कोंकण के पर्यवरणलिद् और कृषि विशेषज्ञों की राय इस मामले में अलग है। रत्नागिरी के पर्यावरणविद् विवेक भिडे ने बीबीसी को बताया, "जलवायु परिवर्तन का असर काफी हद तक आमों की उपज पर भी पड़ता है। बदलते तापमान में कीट आम के पीछे वाले हिस्से में अंडे देते हैं और तापमान बढ़ने के साथ आम पकने लगता है, कीट के अंडे भी बढ़ने लगते हैं। पिछ्ले तीन चार सालों से आम के फ़लों के बारे में शिकायतें मिल रही हैं।"

उन्होंने कहा कि कीटों की इस समस्या के लिए भारत सरकार का विश्व व्यापार संघ के साथ किया समझौता भी ज़िम्मेदार है. समझौता करते वक़्त भारत ने यूरो गॅप यानी यूरोपीय गुड ऍग्रीकल्चरल प्रैक्टिसिस को मंज़ूरी दी थी। लेकिन यूरोप ठंडे मौसम वाला प्रदेश है वहां के कृषि मानक भारत जैसे गर्म प्रदेश में लागू करना सही नहीं होगा।

भिडे का कहना है कि सरकार ने इस विषय पर बिना सोचे-समझे ही समझौते को स्वीकार कर लिया है। ऐसी पाबंदी इसी सब का नतीजा है। उन्होंने कहा, "इस समस्या को दूर करने के लिए 'भारत जीपीए' जैसे मानक बनाने चाहिए, जो यहां के मौसम के अनुकूल हों।"

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed