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पड़ोसियों पर दिखने लगा राजस्थान के श्रम सुधारों का असर

Tue, 19 Aug 2014 12:28 PM IST
सुजय मेहदूदिया/नई दिल्ली
सुजय मेहदूदिया/नई दिल्ली Updated Tue, 19 Aug 2014 12:28 PM IST
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Rajasthan turns the heat on reforms, Haryana and Uttar Pradesh to follow

वसुंधरा राजे सिंधिया के नेतृत्व में राजस्थान में विभिन्न क्षेत्रों में किए जा रहे सुधारों का असर उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा जैसे पड़ोसी राज्य सरकारों पर भी देखा जा रहा है। राजस्थान की तर्ज पर उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब भी घरेलू व विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए अपने पुराने पड़ चुके श्रम व भूमि कानूनों में सुधार के बारे में विचार कर रहे हैं।

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राजस्थान विधानसभा द्वारा पारित किए गए कानून को अब राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। सुधारों को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार का यह पहला बड़ा परीक्षण होगा, इस कानून में किसी भी संशोधन के लिए उसकी सहमति अनिवार्य है। यह देखना है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी नरेंद्र सिंह तोमर राजस्थान सरकार द्वारा किए गए इन संशोधनों का समर्थन करते हैं, खासकर तब जब ऐसा समझा जाता है कि वसुंधरा राजे और नरेंद्र मोदी के बीच सबकुछ बेहतर नहीं है।
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राजस्थान विधानसभा ने पिछले सप्ताह चार महत्वपूर्ण श्रम कानूनों में संशोधन का बिल पारित किया था। जिसका उद्देश्य कंपनियों और नियोक्ताओं के लिए नियुक्ति, प्रशिक्षण और बर्खास्तगी को आसान बनाने के साथ-साथ कामगार संगठनों के पंजीकरण नियमों को सख्त करना है। राजस्थान विधानसभा ने फैक्ट्री कानून, औद्योगिक विवाद अधिनियम, अप्रेंटस्शिप अधिनियम और अनुबंध श्रम (नियमन एवं उन्मूलन) कानून में बदलावों को मंजूरी दे दी है। वसुंधरा राजे सरकार ने पिछले सप्ताह इन बिलों को पेश किया था। यह विषय संविधान की समवर्ती सूची में शामिल है, इसके चलते इन संशोधनों को केंद्र से भी मंजूरी दिलानी होगी।
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राजस्थान सरकार के सुधारों की इस रफ्तार का असर पड़ोसी राज्यों पर भी हो रहा है। हरियाणा, जहां बड़े पैमाने पर जापानी कंपनियों ने निवेश किया है और जिसे एक वैश्विक निवेश गंतव्य के रूप में देखा जाता है, राजस्थान सरकार की इस पहल से बहुत घबराया हुआ है। एक उद्योग संगठन के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में हरियाणा में कई औद्योगिक अशांति देखी गई। मारुति-सुजुकी के मानेसर और गुड़गांव प्लांट में जो हुआ, उससे निवेशकों की सोच में बदलाव आया है। अब वह राष्ट्रीय राजधानी के पास किसी नए निवेश स्थल की तलाश कर रहे हैं और उनके लिए राजस्थान से बेहतर क्या होगा।

इसी तरह, बीते कुछ महीनों से सामाजिक व राजनीतिक अशांति से जूझ रहा उत्तर प्रदेश भी कुछ इसी तरह की उहापोह से गुजर रहा है और अन्य राज्यों की तरह कानूनों में संशोधन पर विचार कर रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार से जुड़े कुछ विश्वस्त लोगों का कहना है कि श्रम सुधारों को लेकर राज्य सरकार की ओर से पहल शुरू हो गई है। वहीं, बिना किसानों व स्थानीय लोगों के हितों को नुकसान पहुंचाए भूमि अधिग्रहण कानून में उचित संशोधनों के लिए केंद्र सरकार को सुझाव भी भेजे जा चुके हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि राज्य सरकार के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना अत्यंत जरूरी है। राज्य सरकार को निवेश आकर्षित करने के लिए औद्योगिक सेक्टर में बड़े पैमाने पर सुधार करने होंगे। यह दूसरे राज्यों से बिना प्रतिस्पर्धा के नहीं किया जा सकता है। हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों की तरह बेहतर अवसर उपलब्ध कराए बिना भी निवेशकों को आकर्षित करना संभव नहीं है।

राजस्थान सरकार द्वारा औद्योगिक विवाद अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों से नियोक्ताओं को बिना सरकार की अनुमति के 300 कर्मचारियों तक की छंटनी का अधिकार होगा। इस समय कंपनियां 100 कर्मचारियों की छंटनी बिना राज्य सरकार की अनुमति से कर सकती हैं। छंटनी के मामले में कर्मचारी को तीन माह के भीतर अपना विरोध जताना होगा। प्रस्तावित संशोधन के मुताबिक एक कर्मचारी संगठन का गठन तभी हो सकता है, जब कुल कर्मियों की संख्या के 30 फीसदी उसके सदस्य बने। फिलहाल यह सीमा 15 फीसदी है।

फैक्ट्री कानून में संशोधनों के अंतर्गत बिना बिजली के संचालित फैक्ट्री में रोजगार की संख्या 20 से बढ़ाकर 40 और बिजली से संचालित उद्योगों में 10 से बढ़ाकर 20 करने का प्रस्ताव है। इस कानून के अंतर्गत हिंसा के मामलों में नियोक्ता के खिलाफ शिकायत पर अदालत बिना राज्य सरकार की पूर्व अनुमति के संज्ञान नहीं ले सकेंगी। इन मामलों में समझौते का भी प्रावधान है। वहीं, अनुबंध श्रम कानून उन्हीं कंपनियों पर लागू होगा, जहां कर्मचारियों की संख्या 50 से अधिक है। वर्तमान में यह सीमा 20 है।


मोदी सरकार ने अपने एजेंडे में श्रम सुधारों को शामिल कर रखा है। इसमें फैक्ट्री कानून, अप्रेंटस्शिप एक्ट आदि शामिल हैं। अप्रेंटस्शिप एक्ट पहले ही पारित हो चुका है और अन्य विधेयकों के संसद के शीतकालीन सत्र में पास होने की संभावना है।

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