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पूरे साल राजनीतिक अस्थिरता का शिकार रहा रेलवे

Sat, 16 Feb 2013 10:05 PM IST
नई दिल्ली/बृजेश सिंह
नई दिल्ली/बृजेश सिंह Updated Sat, 16 Feb 2013 10:05 PM IST
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railway will political instability in last year

रेलवे के इतिहास में बीता साल राजनीतिक अस्थिरता के लिए जाना जाएगा। एक साल में तीन रेलमंत्रियों ने कुर्सी संभाली। पिछला रेल बजट पेश करने वाले दिनेश त्रिवेदी बजट पास कराने के पहले ही हटा दिए गए तो उनके बाद आए मुकुल रॉय कोलकाता में बैठकर रेलवे को चलाने की कोशिश करते रहे।

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नतीजा रेलवे पूरी तरह अनिर्णय का शिकार रहा। अब कांग्रेस के नए रेलमंत्री पवन कुमार बंसल के सामने चुनौती है कि वे बजट में रेलवे को विकास की पटरी पर लाएं और आम लोगों के लिए रेल सेवाओं में सुधार व विस्तार को गति प्रदान करें।
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पिछले डेढ़ दशक से केंद्र में गठबंधन सरकारों की मजबूरी का नाम बन चुके रेल मंत्रालय को फिर से पटरी पर लाने की जरूरत है। अभी तक समर्थन के बदले रेल मंत्री की कुर्सी पर काबिज रहने वाले क्षेत्रीय दलों के नेता लोकप्रियता तथा वोट बैंक की राजनीति के चलते रेलवे के हितों की अनदेखी करते रहे हैं। एक दशक बाद पिछले महीने रेल किरायों में वृद्धि की गई लेकिन यह बढ़ोतरी रेल सेवाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए नाकाफी है।
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रेलवे को यात्री सेवाओं के लिए मालभाड़े से होने वाली आय से अनुदान लेना पड़ता है। रेलमंत्री बंसल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तथा योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया के करीबी माने जाते हैं। रेल सुधारों तथा विकास योजनाओं को पूरा करने के लिए रेलवे की आमदनी में तेजी से वृद्धि करना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

रेलवे की वर्तमान विकास योजनाओं को पूरा करने के लिए हर साल 1.25 लाख करोड़ रुपये की जरूरत है, लेकिन मंत्रालय विभिन्न स्रोतों से 50 से 60 हजार करोड़ रुपये ही जुटा पाने में सक्षम है। ऐसे में संसाधनों के बंटवारे में रेलवे के विकास एवं फायदे को ही प्राथमिकता देनी होगी। लंबित परियोजनाओं को जल्द पूरा करना होगा जिससे योजना में निवेश का फायदा रेलवे को मिलना शुरू हो सके।

डेढ़ सौ साल पुराने रेलवे के आधुनिकीकरण की सख्त जरूरत है। बुलेट ट्रेन, रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण, हाई स्पीड ट्रैक एवं आधुनिक सिग्नलिंग व्यवस्था को लागू करना होगा। इसके लिए सरकारी संसाधनों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है। राजनीतिकरण के चलते निजी क्षेत्र रेलवे की योजनाओं में रुचि नहीं दिखा रहें हैं।


पीपीपी मॉडल की शर्तों में सुधार की जरूरत है। सुविधाओं में विस्तार तथा नई रेल लाइनों के लिए संबंधित राज्यों से भी निवेश के प्रस्ताव को आगे बढ़ाना होगा। लोकप्रिय प्रोजेक्ट एवं परियोजनाओं में विदेशी निवेश के लिए भी ज्यादा प्रयास करने होंगे।

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