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उम्मीदों की रेल: वादों और दावों तक सीमित है रेलवे की सुरक्षा

Wed, 20 Feb 2013 05:57 PM IST
नई दिल्ली/बृजेश सिंह
नई दिल्ली/बृजेश सिंह Updated Wed, 20 Feb 2013 05:57 PM IST
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railway security is limited just promises and claims

भारतीय रेल नेटवर्क चीन के बाद दुनिया का सबसे बड़ा नेटवर्क है। देशभर में लगभग 1.13 लाख किमी लंबे ट्रैक पर प्रतिदिन 11 हजार यात्री गाड़ियां दौड़ती हैं। कई शहरों की तो लाइफ लाइन है रेल। मगर सुरक्षित सफर के लिए रेलवे अभी भी डेढ़ सौ साल पुरानी सिग्नलिंग तकनीक पर निर्भर है। देश में जब भी बड़ी रेल दुर्घटना होती है, तो रेलवे तथा सरकार रेलवे संचालन के लिए आधुनिकतम तकनीक अपनाने के दावे तो करती हैं, लेकिन पिछले एक दशक में यह महज झूठे वादे ही साबित हुए हैं।

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12 साल से सिर्फ ट्रायल
कोंकण रेलवे ने आज से लगभग 12 साल पहले एंटी कोलीजन डिवाइस (एसीडी) तकनीक विकसित की थी। इस तकनीक को पूरी तरह सुरक्षित बताते हुए इसे सारे रेलवे में लागू करने की बात कही गई थी। प्रायोगिक तौर पर शुरू में इसे पूर्वोत्तर रेलवे के कुछ रूटों पर लगाया भी गया। मगर जल्द ही इसे रेलवे के ही दूसरे अधिकारियों ने खारिज कर दिया। यह सिस्टम सिंगल ट्रैक पर तो ठीक था, लेकिन डबल लाइनों पर सामने से आती ट्रेन को देखकर ही उलटी दिशा में आने वाली ट्रेन खुद ब खुद रूक जाती थी। चूंकि देश के अधिकांश हिस्सों में रेल लाइनों के दोहरीकरण की योजना चल रही है, इसलिए एसीडी तकनीक को आगे नहीं बढ़ाया गया।
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ट्रेन प्रोटेक्शन एवं वार्निंग सिस्टम भी अटका
इसके बाद रेलवे ने विदेशी कंपनी की मदद से ट्रेन प्रोटेक्शन एवं वार्निंग सिस्टम (टीपीडब्ल्यूएस) को विकसित किया गया। पिछले कुछ साल से दिल्ली आगरा तथा सेंट्रल रेलवे में एक अन्य रूट पर लगभग 200 किमी ट्रैक पर यह सिग्नल ट्रायल के लिए लगाया गया। लेकिन यह कितना कारगर है, इस पर रेलवे अफसर कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। इसी बीच रेलवे ने एसीडी एवं टीपीडब्ल्यूएस तकनीक को मिलाकर एक नई तकनीक ट्रेन कोलीजन एवायडेंस सिस्टम (टीसीएएस) विकसित करने का दावा किया है। अभी यह तकनीक प्रयोगशाला तक ही सीमित है।
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यात्रियों की सुरक्षा
तमाम इलाकों में रेलवे अपराधियों का अड्डा माना जाता है। रेलवे एक्ट के तहत वर्ष 2010-11 में कुल 16.27 लाख मामले दर्ज किए गये थे। हालांकि वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा होगी। वर्तमान में ट्रेनों में यात्रा के दौरान रेलवे से यात्रियों की सुरक्षा की उम्मीद करना भी बेमानी है। जीआरपी तथा आरपीएफ मिलकर सिर्फ तीस फीसदी चलती ट्रेनों को एस्कॉर्ट उपलब्ध करा पाती हैं। बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों के पद रिक्त हैं। हर वर्ष ट्रेनों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन सुरक्षा बलों के पदों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं की गई।

वर्तमान में ट्रेनों की कुल संख्या -- 11,000
आरपीएफ की तैनाती -- 1275 ट्रेनों में
जीआरपी की तैनाती -- 2200 ट्रेनों में

रेलवे सुरक्षा बल
कुल स्वीकृत पद - 74,538
रिक्त पद - 13,480

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