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'रेल मंत्री ने रेलवे की हालत सुधारने का मौका खोया'
अखिलेश्वर सहाय, सलाहकार, डीएमआरसी
Updated Tue, 26 Feb 2013 09:03 PM IST
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सत्रह साल बाद रेल मंत्रालय की कमान किसी कांग्रेसी मंत्री के हाथ में थी, ऐसे में मुझे उम्मीद थी कि रेल मंत्री पवन कुमार बंसल वित्तीय रुप से जर्जर रेलवे की हालत बेहतर करने के ठोस कदम उठाएंगे। पर रेल मंत्री के बजट से मुझे निराशा ही हुई। साल 2013-14 का रेल बजट दिशाहीन और परेशानियों को बढ़ाने वाला है।
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सबसे अहम बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों से यह मान लिया गया है कि यात्री किराए में बढ़ोतरी तो करना नहीं है। बार-बार केवल मालभाड़ा बढ़ाना है। इस कदम से जहां रेलवे का मालभाड़ा कारोबार कम हो रहा है, वहीं इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। भारतीय रेल का मालभाड़ा दुनिया के प्रमुख देशों की तुलना में सबसे ज्यादा है।
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यह लगातार अपनी हिस्सेदारी खो रहा है। इस समय देश के कुल मालभाड़े में रेलवे की हिस्सेदारी 30 फीसदी रह गई है। जबकि किसी भी स्थिति में इसे 50 फीसदी से ऊपर ही रहना चाहिए। ऐसे समय में जब आप की मालगाड़ी की औसत रफ्तार 25 किलोमीटर प्रति घंटा हो, तो आप मालभाड़ा बढ़ाकर अपने ग्राहक ही खोएंगे।
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रेल मंत्री ने यात्री किराए में कोई बढ़ोतरी नहीं की है। इसका मतलब है कि रेलवे को प्रतिवर्ष 24 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। ऐसे में रेल मंत्री जी नए परियोजनाओं का भी ऐलान कर रहे हैं। इसके लिए उनके पास पैसा कहां से आएगा। नई परियोजनाओं के लिए दो लाख करोड़ रुपये की जरूरत है। रेल मंत्री ने 94 नई ट्रेनें शुरू करने की घोषणा कर दी है। जब आपके पास डिब्बे खरीदने के लिए ही पैसे नहीं हैं तो आप गाड़ियां कैसे चलाएंगे।
अहम बात यह है कि 12 वीं योजना में रेलवे को पांच लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की जरूरत है। जिसमें से एक लाख करोड़ रुपये सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत जुटाने का लक्ष्य है। जबकि वास्तविकता यह है कि पिछले साल कोई भी निवेश पीपीपी के जरिए नहीं आया है, इसी तरह वित्त वर्ष 2013-14 के लिए 6000 करोड़ रुपये का ही लक्ष्य है। तो ऐसे में एक लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य कहां से पूरा होगा।
जहां तक ऑपरेटिंग रेशियों की बात है तो रेल मंत्री इसके 88 फीसदी रहने की बात कर रहे हैं। अगर रेलवे के खर्च और आय को देखा जाय, तो इसे पाना जादू से कम नहीं है। ऐसे में मुझे तो यही लगता है कि रेल मंत्री के पास कोई जादू की छड़ी लग गई है।
रेल मंत्री इसी तरह ढुलाई के लक्ष्यों को 104.7 करोड़ टन रहने की बात कह रहे है। पिछले साल के तो तय लक्ष्य भी पूरे नहीं हो पाए हैं। जबकि 2011-12 के लिए सरकार 110 करोड़ टन रहने की बात कही थी। कुल मिलाकर रेल बजट रेलवे की वित्तीय हालात सुधारने की दिशा में नाकाम पहल है।