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प्रधानमंत्री अपनी नाकामी दूसरों पर थोप कर चल दिए!

Fri, 03 Jan 2014 07:59 PM IST
हरवीर सिंह, अमर उजाला/ नई दिल्ली
हरवीर सिंह, अमर उजाला/ नई दिल्ली Updated Fri, 03 Jan 2014 07:59 PM IST
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prime minister off to their failure to impose on others!

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दस साल में अपने तीसरे और संभवत: अपने मौजूदा कार्यकाल के अंतिम संवाददाता सम्मेलन में आर्थिक मोर्चे पर देश को आगे ले जाने के दावे जमकर किए लेकिन संकट से जूझ रही अर्थव्यवस्था, ऊंची महंगाई दर, घटते औद्योगिक उत्पादन, रोजगार सृजन के मोर्चे पर नाकामी और भ्रष्टाचार के आरोपों का ठीकरा वह दूसरों पर फोड़ते नजर आए।

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उन्होंने बताया कि उनके कार्यकाल के दौरान देश में विकास दर 7.7 फीसदी के औसत पर रही जो अब तक का सबसे अच्छा रिकार्ड है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर हालात सुधर रहे हैं और एक बार फिर देश तेज विकास दर की ओर बढ़ रहा है।
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किसी रोडमैप को वह पेश नहीं कर

प्रधानमंत्री ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों में आर्थिक मोर्चे पर वह जो कर सकते थे वह सब कुछ किया। लेकिन देश की जनता के लिए क्या जरूरी था और वहां सरकार क्यों नाकाम रही, इस बारे में वह या तो चुप रहे या जिम्मेदारी दूसरों पर डालते दिखे। साथ ही आर्थिक मोर्चे पर किसी रोडमैप को वह पेश नहीं कर पाये।
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प्रधानमंत्री के इस संवाददाता सम्मेलन के मौके पर यूपीए सरकार का रिपोर्ट कार्ड प्रगति और विकास के दस साल पेश किया गया। प्रधानमंत्री ने भी सवालों के जवाब में यह तथ्य सामने रखे। देश में महंगाई को न रोक पाने के चलते राजनीतिक खामियाजा भुगतने की बात उन्होंने स्वीकार की। इसके साथ ही मैन्यूफैक्चरिंग विकास दर तेज करने और रोजगार सृजन के मोर्चे पर नाकामी उन्होंने गिनाई, वहीं भ्रष्टाचार के आरोपों को सीधे स्वीकार करने उन्होंने हिचक दिखाई।

वैश्विक अर्थव्यवस्था का संकट
विकास दर के बेहतर प्रदर्शन का उन्होंने जिक्र किया लेकिन चालू साल में यह पांच फीसदी से नीचे जा रही है इसके लिए उन्होंने वैश्विक अर्थव्यवस्था के संकट को बड़ा कारण बताया। इसी तरह महंगाई के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊंची कीमतों को जिम्मेदार बताया जबकि सबसे ज्यादा महंगाई खाद्य उत्पादों में रही।

उसमें भी फल, सब्जी और प्रोटीन उत्पाद ज्यादा जिम्मेदार रहे। इनमें से अधिकांश में भारत के सबसे बड़े उत्पादक के रूप में उभरने की बात उन्होंने कही। वहीं महंगाई को रोकने में अधिकांश जिम्मा राज्यों का होने की बात कही। साथ ही उन्होंने दावा किया कि महंगाई के मुकाबले लोगों की आय ज्यादा तेजी से बढ़ी है।

रोजगार देने के मोर्चे पर सरकार नाकाम

यहां पेश रिपोर्ट कार्ड के मुताबिक यूपीए के कार्यकाल में गरीबों की संख्या 37.2 फीसदी से घटकर 21.9 फीसदी रह गई। वहीं बेरोजगारी दर 2004 के 8.2 फीसदी से घटकर 2012 में 5.6 फीसदी रह गई। लेकिन प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया कि रोजगार देने के मोर्चे पर सरकार नाकाम रही है। इसी तरह ग्रामीण और कृषि विकास दर के मोर्चे और खाद्यान्न उत्पादन में काफी सुधार की बात की गई। लेकिन इसके बावजूद खाद्यान्न की कीमतों में दो अंकों में बढ़ोतरी दर्ज की गई। डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर (डीबीटी) को उन्होंने बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया लेकिन रसोई गैस के मामले में आंशिक रूप से लागू किए जाने के अलावा बाकी किसी मद में यह योजना सिरे नहीं चढ़ रही है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को बढ़ावा देने और आर्थिक सुधारों को जारी रखने के लिए उनकी सरकार तेजी से काम कर रही है और करती रहेगी। लेकिन सचाई यह है कि चालू साल में अप्रैल से नवंबर के बीच एफडीआई में 15 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।


अटके हुए 293 प्रोजेक्ट

उन्होंने कहा कि सीसीआई ने 2013 में 5.7 लाख करोड़ रुपए के अटके हुए 293 प्रोजेक्ट मंजूर किए। लेकिन उद्योग जगत के दबाव में ऐसा हुआ क्योंकि सरकार के मंत्रियों के अडंगे की वजह के प्रोजेक्ट अटकने से नया निवेश ही ठहर गया है और कमजोर औद्योगिक उत्पादन दर उसका सुबूत है। ढांचागत मोर्चे पर जहां देश को एक अरब डॉलर के निवेश की जरूरत है वहीं बिजली उत्पादन से लेकर सड़क और रेलवे में तेजी से नई क्षमता जोड़ने के मोर्चे पर सरकार लगातार नाकाम रही है हालांकि इन मोर्चो पर बेहतर करने का दावा प्रधानमंत्री ने किया।

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