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अनाज भंडार के बफर मानकों को बढ़ाने की तैयारी

Fri, 24 May 2013 08:59 PM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
नई दिल्ली/ब्यूरो Updated Fri, 24 May 2013 08:59 PM IST
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preparing to increase grain reserves to buffer standards

सरकारी गोदामों में जरूरत से ज्यादा अनाज भंडार को लेकर आलोचना से घिरी केंद्र सरकार अब भंडार मानकों को बढ़ाने की तैयारी कर रही है। केंद्रीय पूल के बफर नॉर्म्स में इजाफा होने से अनाज के रिकॉर्ड भंडार को तर्कसंगत ठहराने में आसानी होगी।

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खाद्य मंत्रालय ने आबादी के नए आंकड़ों के आधार पर बफर नॉर्म्स में संशोधन की तैयारी शुरू कर दी है। फिलहाल सरकारी गोदामों में बफर मानकों से करीब ढाई गुना ज्यादा अनाज जमा है। इसके बावजूद पिछले एक साल के दौरान अनाज और इसके उत्पादों की खुदरा महंगाई करीब 16 फीसदी बढ़ी है।
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खाद्य मंत्रालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि मौजूदा बफर नॉर्म्स आठ साल पहले 2005 में निर्धारित किए गए थे। उसके बाद से इन मानकों में संशोधन नहीं हुआ है। हालांकि, सरकार ने बफर नॉर्म्स के अलावा वर्ष 2008 में 30 लाख टन गेहूं और 20 लाख टन चावल के अतिरिक्त भंडार का सुझाव दिया था।
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बढ़ी आबादी, खाद्य सुरक्षा कानून और केंद्रीय योजनाओं की जरूरतों को ध्यान में रखकर केंद्रीय पूल में अनाज भंडार के बफर नॉर्म्स की समीक्षा की जा रही है। माना जा रहा है कि अधिकतम बफर नॉर्म्स को 319 लाख टन से बढ़ाकर 350-400 लाख टन किया जाएगा।

खाद्य नीति के विशेषज्ञ बिराज पटनायक का कहना है कि बफर मानकों से कहीं ज्यादा अनाज भंडारों में जमा होना, सरकार की खाद्य वितरण नीति की खामियों को उजागर करता है। इस तरह गोदामों में जमा अनाज का बड़ा हिस्सा वहीं सड़ जाएगा। सरकार अनाज को गोदामों से निकालकर जनता में बांटे तो खाद्यान्न महंगाई पर काबू पाया जा सकता है।

रिकॉर्ड भंडार को बचाना होगा बड़ी चुनौती
मौजूदा बफर मानकों के हिसाब से फिलहाल केंद्रीय पूल में साल के दौरान खाद्यान्न भंडार 212 लाख टन से 319 लाख टन के बीच होना चाहिए। भारतीय खाद्य निगम के आंकड़ों के अनुसार, गत एक मई को केंद्रीय पूल में कुल 775 लाख टन अनाज जमा हो चुका है।


यानी, सरकारी गोदामों में मानकों से करीब ढाई गुना ज्यादा अनाज भरा पड़ा है और करीब 80-90 लाख टन गेहूं सरकारी गोदामों में पहुंचने की उम्मीद है। पिछले साल जून में केंद्रीय पूल का भंडार 824 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा था। इस साल यह रिकॉर्ड टूट सकता है लेकिन मानसून के दौरान इस रिकॉर्ड मात्रा को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

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