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बिजली को निकालना होगा सियासत के जंजाल से
Sun, 06 Jul 2014 09:02 PM IST
नई दिल्ली/हैरी धौल, डायरेक्टर जनरल, इंडीपेंडेंट पावर प्रोड्यसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आईपीपीएआई)
नई दिल्ली/हैरी धौल, डायरेक्टर जनरल, इंडीपेंडेंट पावर प्रोड्यसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आईपीपीएआई)
Updated Sun, 06 Jul 2014 09:02 PM IST
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भारत में इन दिनों बिजली का वितरण भ्रमपूर्ण और राजनीति में जकड़ा हुआ है। 1970 के शुरूआत तक भारत में सरप्लस बिजली की स्थिति थी, उस समय समस्या इसको वितरित करने की थी।
दूसरे शब्दों में कहें तो उस समय उपभोक्ता पाना मुश्किल था। 1970 से बिजली की मांग बढ़ने से यह स्पष्ट हो गया कि बिजली वितरण भारत के विकास में बेहद अहम भूमिका अदा करेगा। 60 के दशक के मध्य में हरित क्रांति की शुरुआत हुई, जहां ज्यादा उपज के लिए अनुवांशिक रूप से संशोधित फसलें लाईं गईं।
इससे भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो सका। महाराष्ट्र में सहकारिता आंदोलन शुरू होने के साथ बिजली की मांग बढ़ी। इससे ऐसी स्थिति बनी, जहां किसानों को मानसून आधारित फसलों से हटा कर ज्यादा पानी की जरूरत वाली फसलों जैसे गन्ना, चावल, गेहूं के साथ कपास की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इससे कृषि क्षेत्र में भूमिगत जल का इस्तेमाल काफी बढ़ा।
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भूमिगत जल का इस्तेमाल न सिर्फ खेती का विस्तार होने से बढ़ा बल्कि कृषि उत्पादन में प्रति हेक्टेयर भूमिगत जल का इस्तेमाल भी बढ़ा। शुरूआती चरण में भूमिगत जल 25-30 फीट की गहराई पर था, जिससे खेत की सिंचाई के लिए बहुत कम क्षमता वाले पंपिंग सेट की जरूरत होती थी। बाद में भूमिगत जल संसाधनों के विस्तार और मोटर व पंपों का आकर 5 एचपी से 25 एचपी तक बढ़ने से समस्या बढ़ी।
बाद में यह समस्या और बढ़ी जब राजनेताओं ने फैसला किया कि किसानों को बिजली का बिल देने की जरूरत नहीं है। इसका नतीजा एक ऐसे राजनीतिक वातावरण के रूप में सामने आया, जहां सरकार रियायती दर पर बीज, बैंकों से कर्ज और अंतत: मुफ्त बिजली मुहैया करा कर समूचे किसान समुदाय का वोट बैंक नियंत्रित कर सकती थी। इससे किसानों को एक वोट बैंक के तौर पर शोषण शुरू हुआ।
यह राजनीतिक परिदृश्य बाद में शहरी भारत में फैला, जहां ग्रामीण भारत से नौकरी और बेहतर जिंदगी की तलाश में शहर आए प्रवासियों ने बड़े पैमाने पर झुग्गी बस्तियां बसाईं। राजनीतिक नेतृत्व ने इन लोगों को एक बार फिर से वोट बैंक माना और इन लोगों को अनधिकृत कालोनी में बिजली का कनेक्शन देकर मुफ्त बिजली दी। बिजली की लागत सहित पूरे पावर सेक्टर का अर्थशास्त्र राजनेताओं के कारण प्रभावित हुआ।
मौजूदा समय में देश में मुश्किल से कोई ऐसी वितरण कंपनी होगी, जो राजनेताओं के निर्देश पर उनके वोटबैंक को मुफ्त या रियायती दर पर बिजली मुहैया कराने का बोझ न उठा रही हो। ऐसे में किसी वितरण कंपनी के लिए राजनीतिक नेतृत्व के हस्तक्षेप के कारण निजी संस्थान के तौर पर काम करना कठिन है। बिजली, समवर्ती विषय होने के कारण समस्या यह है कि केंद्र सरकार राज्यों में पावर सेक्टर के राजनीतिकरण पर अंकुश नहीं लगा सकती है। इस बीच, वितरण कंपनियां करोड़ों रुपये के नुकसान में चल रहीं हैं।
ये कंपनियां बिना किसी जवाबदेही के काम कर रहीं हैं क्योंकि इनको राजनीतिक नेतृत्व का संरक्षण हासिल है। यह चिंता का एक और विषय है कि बिजली वितरण कंपनियां उपभोक्ताओं के लिए संपत्ति बनने के बजाए देनदारी बन गईं हैं। उपभोक्ता ओपेन एक्सेस या प्रतिस्पर्धा के जरिए सस्ती बिजली नहीं पा सकता है,जब तक राजनीतिक नेतृत्व का हस्तक्षेप खत्म नहीं होता है।
पिछली सरकार ने नेशनल टेरिफ पॉलिसी के जरिए इलेक्ट्रिसिटी एक्ट में संशोधन का प्रयास किया था, लेकिन यह असफल रहा। राजनीतिक नेतृत्व दिल्ली में बैठे कुछ लोगों को खुश करने के लिए आपने वोट बैंक पर से नियंत्रण नहीं खोना चाहता है। निष्कर्ष यह है कि बिजली वितरण सेक्टर की समस्या को राजनीति से मुक्त किए बिना नहीं सुलझाया जा सकता। दूसरा, अगर उपभोक्ता मुफ्त बिजली चाहता है, जिसे पैदा काने, वितरित करने में बड़े पैमाने पर लागत आती है, तो वह किसी और दुनिया में जी रहा है।
बिजली वितरण की समस्या सुलझाने के लिए पावर सेक्टर को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना होगा। इसके अलावा उपभोक्ताओं को जागरूक करना होगा कि उन्हें इस्तेमाल की गई बिजली के लिए भुगतान करना हेगा। जिससे बिजली वितरण व्यवस्था मजबूत बने और एक देश के तौर पर हम ज्यादा बिजली का उत्पादन कर देश का विकास सुनिश्चित कर सकें।
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दूसरे शब्दों में कहें तो उस समय उपभोक्ता पाना मुश्किल था। 1970 से बिजली की मांग बढ़ने से यह स्पष्ट हो गया कि बिजली वितरण भारत के विकास में बेहद अहम भूमिका अदा करेगा। 60 के दशक के मध्य में हरित क्रांति की शुरुआत हुई, जहां ज्यादा उपज के लिए अनुवांशिक रूप से संशोधित फसलें लाईं गईं।
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इससे भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो सका। महाराष्ट्र में सहकारिता आंदोलन शुरू होने के साथ बिजली की मांग बढ़ी। इससे ऐसी स्थिति बनी, जहां किसानों को मानसून आधारित फसलों से हटा कर ज्यादा पानी की जरूरत वाली फसलों जैसे गन्ना, चावल, गेहूं के साथ कपास की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इससे कृषि क्षेत्र में भूमिगत जल का इस्तेमाल काफी बढ़ा।
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भूमिगत जल का इस्तेमाल न सिर्फ खेती का विस्तार होने से बढ़ा बल्कि कृषि उत्पादन में प्रति हेक्टेयर भूमिगत जल का इस्तेमाल भी बढ़ा। शुरूआती चरण में भूमिगत जल 25-30 फीट की गहराई पर था, जिससे खेत की सिंचाई के लिए बहुत कम क्षमता वाले पंपिंग सेट की जरूरत होती थी। बाद में भूमिगत जल संसाधनों के विस्तार और मोटर व पंपों का आकर 5 एचपी से 25 एचपी तक बढ़ने से समस्या बढ़ी।
बाद में यह समस्या और बढ़ी जब राजनेताओं ने फैसला किया कि किसानों को बिजली का बिल देने की जरूरत नहीं है। इसका नतीजा एक ऐसे राजनीतिक वातावरण के रूप में सामने आया, जहां सरकार रियायती दर पर बीज, बैंकों से कर्ज और अंतत: मुफ्त बिजली मुहैया करा कर समूचे किसान समुदाय का वोट बैंक नियंत्रित कर सकती थी। इससे किसानों को एक वोट बैंक के तौर पर शोषण शुरू हुआ।
यह राजनीतिक परिदृश्य बाद में शहरी भारत में फैला, जहां ग्रामीण भारत से नौकरी और बेहतर जिंदगी की तलाश में शहर आए प्रवासियों ने बड़े पैमाने पर झुग्गी बस्तियां बसाईं। राजनीतिक नेतृत्व ने इन लोगों को एक बार फिर से वोट बैंक माना और इन लोगों को अनधिकृत कालोनी में बिजली का कनेक्शन देकर मुफ्त बिजली दी। बिजली की लागत सहित पूरे पावर सेक्टर का अर्थशास्त्र राजनेताओं के कारण प्रभावित हुआ।
मौजूदा समय में देश में मुश्किल से कोई ऐसी वितरण कंपनी होगी, जो राजनेताओं के निर्देश पर उनके वोटबैंक को मुफ्त या रियायती दर पर बिजली मुहैया कराने का बोझ न उठा रही हो। ऐसे में किसी वितरण कंपनी के लिए राजनीतिक नेतृत्व के हस्तक्षेप के कारण निजी संस्थान के तौर पर काम करना कठिन है। बिजली, समवर्ती विषय होने के कारण समस्या यह है कि केंद्र सरकार राज्यों में पावर सेक्टर के राजनीतिकरण पर अंकुश नहीं लगा सकती है। इस बीच, वितरण कंपनियां करोड़ों रुपये के नुकसान में चल रहीं हैं।
ये कंपनियां बिना किसी जवाबदेही के काम कर रहीं हैं क्योंकि इनको राजनीतिक नेतृत्व का संरक्षण हासिल है। यह चिंता का एक और विषय है कि बिजली वितरण कंपनियां उपभोक्ताओं के लिए संपत्ति बनने के बजाए देनदारी बन गईं हैं। उपभोक्ता ओपेन एक्सेस या प्रतिस्पर्धा के जरिए सस्ती बिजली नहीं पा सकता है,जब तक राजनीतिक नेतृत्व का हस्तक्षेप खत्म नहीं होता है।
पिछली सरकार ने नेशनल टेरिफ पॉलिसी के जरिए इलेक्ट्रिसिटी एक्ट में संशोधन का प्रयास किया था, लेकिन यह असफल रहा। राजनीतिक नेतृत्व दिल्ली में बैठे कुछ लोगों को खुश करने के लिए आपने वोट बैंक पर से नियंत्रण नहीं खोना चाहता है। निष्कर्ष यह है कि बिजली वितरण सेक्टर की समस्या को राजनीति से मुक्त किए बिना नहीं सुलझाया जा सकता। दूसरा, अगर उपभोक्ता मुफ्त बिजली चाहता है, जिसे पैदा काने, वितरित करने में बड़े पैमाने पर लागत आती है, तो वह किसी और दुनिया में जी रहा है।
बिजली वितरण की समस्या सुलझाने के लिए पावर सेक्टर को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना होगा। इसके अलावा उपभोक्ताओं को जागरूक करना होगा कि उन्हें इस्तेमाल की गई बिजली के लिए भुगतान करना हेगा। जिससे बिजली वितरण व्यवस्था मजबूत बने और एक देश के तौर पर हम ज्यादा बिजली का उत्पादन कर देश का विकास सुनिश्चित कर सकें।