पीएम मोदी भी नहीं सुलझा पाए गैस कीमतों का मसला!
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पेट्रोलियम सेक्टर से जुड़े मुद्दे सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से दखल दिए जाने के बावजूद गैस की कीमतें तय करने का मामला अब भी अनसुलझा पड़ा है।
आम आदमी पर कोई आर्थिक बोझ डाले बिना गैस मूल्य निर्धारित करने को लेकर कोई प्रगति न हो पाने के चलते बिजली उत्पादन के मोर्चे पर भी परेशानी पेश आ रही है।
विवाद के चलते बिजली कंपनियों को गैस की पर्याप्त आपूर्ति नहीं हो पा रही है। इससे करीब 30 हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन नहीं किया जा पा रहा है। यह स्थिति तब है, जबकि देश बिजली के संकट से जूझ रहा है।
क्यों नहीं सुलझ रहा मसला?
इस मामले को सुलझाने के लिए हुई बैठक के बारे में अमर उजाला को सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय पावर सेक्टर को हो रही गैस की कमी के मामले को सुलझाने के लिए गैस प्राइस पूलिंग का उपाय अपनाने पर जोर दे रहा है।
मंत्रालय के इस प्रस्ताव पर दो कारणों से बात आगे नहीं बढ़ पा रही है। एक, तो इससे उत्पादन लागत बढ़ने के चलते बिजली और उर्वरकों की कीमतें बढ़ सकती हैं या फिर इससे केंद्र सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ जाएगा, जोकि पहले से ही काफी अधिक है।
सब्सिडी का बोझ घटाने पर चर्चा
मंत्रालय के आला अधिकारियों के मुताबिक इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पेट्रोलियम मंत्रालय धर्मेंद्र प्रधान के साथ लंबी चर्चा हुई है। इस कवायद में ऊर्जा मंत्रालय के अधिकारी भी शामिल रहे।
बैठक में सस्ती दरों पर एलपीजी और केरोसिन की बिक्री के चलते सरकार पर पड़ रहे सब्सिडी के बोझ को घटाने समेत कई मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया, पर इस बैठक का कोई नतीजा नहीं निकला।
बैठक में महज इतना तय हो पाया कि संकट के समाधान के लिए घरेलू स्तर पर गैस व पेट्रोलियम का उत्पादन बढ़ाकर लिंकेज में सुधार लाने की जरूरत है। ऐसा करके ही आपूर्ति में कमी के चलते बिजली संयंत्रों में क्षमता के अनुरूप उत्पादन न हो पाने की समस्या को हल किया जा सकता है।
30,300 मेगावाट बिजली की कमी
एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक इस समय गैस की कमी के चलते देश के बिजली घरों में बिजली के उत्पादन में करीब 30,300 मेगावाट की कमी देखने को मिल रही है। रिलायंस के केजी डी-6 गैस क्षेत्र में गैस के उत्पादन में कमी ने हालात को और भी उलझा दिया है।
सरकार का मानना है कि रिलायंस अपने गैस क्षेत्र से पर्याप्त मात्रा में गैस का उत्पादन कर पाने में नाकाम रही है। ऐसे में उसे गैस के दाम बढ़ाने की मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए और गैस मूल्य निर्धारण का मामला किसी ऐसे फार्मूले के जरिए सुलझाया जाना चाहिए कि इससे आम आदमी पर कोई बोझ न पड़ने पाए।
गैस कीमतों का समला सुलझाना आसान नहीं
बैठक में प्रधानमंत्री के समझ यह भी स्पष्ट किया गया कि गैस कीमतों का मसला इतना आसान नहीं है कि इसे सरलता के साथ सुलझा लिया जाए। घरेलू उत्पादन के जरिए पावर सेक्टर की गैस संबंधी जरूरतों को पूरा किया जा पाना मुश्किल है, जबकि आयातित एलएनजी काफी महंगी पड़ती है। हालांकि इस बैठक के जरिए प्रधानमंत्री द्वारा परोक्ष दबाव डाले जाने के बाद ही पेट्रोलियम मंत्रालय गैस प्राइस पूलिंग के फार्मूले पर एक बार फिर से विचार करने की ओर बढ़ा है।
आम आदमी को होगा नुकसान
यह फार्मूला यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल में भी एक बार चर्चा में आया था, पर इससे बिजली और उर्वरक की कीमतों में बढ़ोतरी होने पर सरकार के ऊपर सब्सिडी का बोझ बढ़ने के मद्देनजर विचार नहीं किया गया।
एक बार फिर से इस फार्मूले को लेकर यही सवाल आ खड़ा हुआ है कि अगर सरकार इसे अपना कर मूल्य वृद्धि का बोझ को ग्राहकों पर डालने का फैसला करती है तो बिजली उत्पादन की लागत बढ़ने का खामियाजा आम आदमी को उठाना पड़ेगा, जबकि खाद के दाम बढ़ने का बोझ किसानों के कंधे पर आएगा। दूसरी ओर बोझ खुद उठाने पर सरकार पर सब्सिडी का बोझ बेतहाशा बढ़ जाएगा।