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योजना आयोग के गले की फांस बनी रघुराम राजन की रिपोर्ट

Sat, 19 Oct 2013 02:00 PM IST
अमर उजाला, दिल्ली
अमर उजाला, दिल्ली Updated Sat, 19 Oct 2013 02:00 PM IST
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planning commission raghuram rajan report

राज्यों के पिछड़ेपन पर रघुराम राजन की रिपोर्ट योजना आयोग के गले की फांस बन गई है।

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विशेष राज्य के दर्जे को खत्म करने का सुझाव देने वाली इस रिपोर्ट पर आयोग को अपना रुख तय करना है। लेकिन इस मुद्दे पर सरकार और आयोग के भीतर पैदा मतभदों ने मामला उलझा दिया है।

इस बीच, रिपोर्ट के विरोध और समर्थन में दबाव बनाने की राजनीति तेज हो गई है। बंगाल के स्पेशल पैकेज की मांग और रिपोर्ट के विरोध में तृणमूल कांग्रेस के सांसद सोमवार को वित्त मंत्री पी. चिदंबरम से मिलेंगे।
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इस रिपोर्ट से पश्चिम बंगाल की विशेष पैकेज की मांग को झटका लगा है जबकि बिहार, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश को अति पिछड़पन का फायदा मिल सकता है।

योजना आयोग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि राज्यों को वित्तीय संसाधनों के बंटवारे के तरीके में बदलाव की राह आसान नहीं है।

इसमें वित्त आयोग और राष्ट्रीय विकास परिषद की भी अहम भूमिका होती है। अभी केंद्र की ओर से राज्यों को गाडगिल-मुखर्जी फॉर्मूले के आधार पर फंड का बंटवारा होता है। जिसमें 30 फीसदी केंद्रीय सहायता विशेष राज्यों को मिलती है।
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इसके बजाय रघुराम राजन समिति ने राज्यों को तीन श्रेणियों-सबसे कम विकसित, कम विकसित और अपेक्षाकृत विकसित, में बांटने की सिफारिश की है।

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने इसका कड़ा विरोध किया है तो बिहार के मुख्यमंत्री रिपोर्ट के आधार पर राज्य को विशेष पैकेज की मांग कर रहे हैं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने सांसदों को वित्त मंत्री के सामने रघुराम राजन समिति की रिपोर्ट पर कड़ा विरोध दर्जा कराने को कहा है। इसकी कमान तृणमूल कांग्रेस के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष मुकुल राय को सौंपी गई है।

समिति ने बंगाल को सबसे कम विकसित राज्य के बजाय कम विकसित की श्रेणी में रखा है। जिसके चलते राज्य को केंद्र से मिलने वाले फंड में करीब 4 हजार करोड़ रुपए की कटौती हो सकती है।


अगर सरकार इन सिफारिशों को मानती है तो उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर समेत उत्तर-पूर्व के कई राज्यों को झटका लग सकता है। अभी कुल 11 राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा हासिल है।

राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों और समीकरणों की भूमिका को देखते हुए विशेष राज्य के दर्जे को खत्म करने का मामला लोकसभा चुनाव तक टलता दिख रहा है।

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