फिर गिर सकते हैं पेट्रोल-डीजल और एलपीजी के दाम
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इंडियन बास्केट के कच्चे तेल की कीमत एक बार फिर से 50 डालर के नीचे पहुंच गई है। यह पिछले आठ महीने के न्यूनतम स्तर है। इसके साथ ही एक बार फिर से पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की कीमतों में कटौती के आसार बन गए हैं।
इससे अर्थव्यवस्था को तो फायदा पहुंचेगा ही, सरकार के सब्सिडी बिल में भी करीब 1,000 करोड़ रुपये की बचत होने की संभावना है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 6 अगस्त को इंडियन बास्केट कच्चे तेल की कीमत 49.11 डॉलर प्रति बैरल थी।
यदि इसे भारतीय मुद्रा के हिसाब से भी देखा जाए, तो उस दिन रुपया-डॉलर की विनिमय दर 63.76 रुपये थी, मतलब एक बैरल कच्चे तेल की कीमत 3,131.25 रुपये रही। इससे पहले जनवरी 2015 में इसकी कीमत 50 डॉलर से नीचे आई थी।
ज्यादा बचत!
केंद्रीय वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि चालू वित्त वर्ष के
दौरान कच्चे तेल की औसत कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल आंकी गई है। इस वर्ष के
शुरुआती चार महीनों में इसकी औसत कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल रही थी।
इससे
आयात बिल में करीब 65,000 करोड़ रुपये की बचत हो रही है। अब तो कीमत घट कर
50 डॉलर से नीचे पहुंच गई है। मतलब और ज्यादा बचत।
पेट्रोलियम सब्सिडी के
बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि चालू वर्ष के दौरान इस मद में
30,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
तेल की कीमत घटने का मिलेगा लाभ
इस समय कच्चे तेल की कीमत चल
रही है, उससे लगता है कि इसमें भी सरकार को करीब 1,000 करोड़ रुपये से
ज्यादा की बचत होगी।
अभी यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की
कीमत में यदि एक डॉलर की कमी आती है, तो भारत का आयात बिल 6,500 करोड़
रुपये तक घट जाता है।
हालांकि डॉलर के मुकाबले रुपये के घटते मूल्य से इस
पर थोड़ा असर पड़ा है, लेकिन तब भी तेल की कीमत घटने का तो लाभ मिलेगा ही।
कम वर्किंग कैपिटल की होगी जरुरत
कीमत में कटौती से सरकार के साथ-साथ आम जनता को भी पेट्रोल-डीजल और एलपीजी
के कीमतों में कटौती की सौगात मिल सकती है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में
कच्चे तेल की कीमत घटने का फायदा तेल विपणन करने वाली सरकारी कंपनियों को
प्रत्यक्ष रूप से मिलेगा। इंडियन ऑयल, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम और भारत
पेट्रोलियम जैसी कंपनियों को अब कच्चे तेल के आयात के लिए कम वर्किंग
कैपिटल की जरूरत होगी।
आमतौर पर यह कंपनियां बाजार से उधार जुटाकर कच्चे
तेल का आयात करती हैं और जब तैयार उत्पाद बिक जाता है तो उधार चुका दिया
जाता है।