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मुनाफे की रिकवरी के लिए रावा साझेदारों को नोटिस भेज सकती है सरकार
नई दिल्ली/ सुजय मेहदूदिया
Updated Sun, 13 Jul 2014 09:00 PM IST
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रावा फील्ड के पेट्रोलियम मुनाफे में अपनी 31.4 करोड़ डॉलर की हिस्सेदारी हासिल करने के लिए सरकार फील्ड की साझेदार कंपनियों को कारण बताओ नोटिस भेज सकती है।
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पेट्रोलियम एवं नेचुरल गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने फील्ड की साझेदार कंपनियों ओएनजीसी, केयर्न इंडिया, रावा ऑयल (सिंगापुर) और वीडियोकॉन को कारण बताओ नोटिस भेजने की पुरजोर वकालत की है। सरकार का दावा है कि रावा फील्ड से हुए मुनाफे में उसकी हिस्सेदारी 31.4 करोड़ डॉलर है, जिसे साझेदार कंपनियों ने गलत तरीके से कम कर दिया। इस बीच, केयर्न इंडिया ने इस फील्ड में उत्पादन भागीदारी करार 10 साल के लिए बढ़ाने की मांग की है।
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पेट्रोलियम मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि सरकार इस विवादित धनराशि की रिकवरी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (ओएमसी) के जरिए करने पर विचार कर रही थी। जिसके तहत ओएमसी को विभिन्न ऑपरेटरों की बिक्री से हुई आमदनी के माध्यम से यह रिकवरी करने का निर्देश दिया जाना था।
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हालांकि, जब इस मामले की फाइल धर्मेंद्र प्रधान के पास ओएमसी के जरिए सीधे 31.4 करोड़ डॉलर हासिल करने के आदेश जारी करने के लिए भेजी गई, तो उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से ऐसी कोई भी कार्रवाई करने से पहले एक व्यवस्थित कारण बताओ नोटिस रावा फील्ड के साझेदारों को दिया जाए।
रावा फील्ड में मुनाफे की हिस्सेदारी को लेकर सरकार और ठेकेदार कंपनियों ओएनजीसी, केयर्न एनर्जी, रावा ऑयल प्राइवेट लिमिटेड और वीडियोकॉन के बीच विवाद है। जो कि कंपनियों द्वारा अर्जित पोस्ट टैक्स रेट ऑफ रिटर्न (पीटीआरआर) पर आधारित था। सरकार के दावे के मुताबिक कंपनियों ने गलत तरीके से पीटीआरआर को कम किया है और सरकार को कम पेट्रोलियम मुनाफे (28.4 करोड़ डॉलर) का भुगतान किया।
पीटीआरआर की इस गलत गणना का सरकार ने विरोध किया था। इसके बाद कंपनियों ने दो अलग-अलग कार्रवाइयों में मध्यस्थता की मांग की थी। पहली केयर्न एनर्जी इंडिया और रावा ऑयल (सिंगापुर) और दूसरी वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज की ओर से की गई थी। हालांकि, विदेश की एक अदालत ने इस मामले में सरकार के खिलाफ फैसला दिया था।
सूत्रों का कहना है कि पेट्रोलियम मंत्री के निर्देश के बाद मंत्रालय के सामने अब मुश्किल यह है कि रावा साझेदारों को किस तरह का नोटिस जारी करना चाहिए। पेट्रोलियम मंत्रालय के आंतरिक वित्त विभाग (आईएफडी) का मानना है कि प्रस्तावित नोटिस दो अलग-अलग नोटिसों में होना चाहिए।
एक 30 दिन का नोटिस प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के आधार पर जारी किया जाना चाहिए। वहीं 90 दिन का नोटिस पीएससी (अनुच्छेद 31.1) के प्रावधानों के तहत जारी करने जरूरत है। आईएफडी का तर्क है कि इन दोनों नोटिसों को एक नोटिस में मिला देना भ्रामक हो सकता है।
इससे भी पहले, यह निर्णय करने की आवश्यकता है कि क्या दो मामलों, शार्ट पेमेंट मोड और रिकवरी ऑफ पेमेंट, को उसी नोटिस में शामिल करना चाहिए या इन्हें दो अलग-अलग नोटिस में रखने की जरूरत है। हालांकि, रावा फील्ड से जुड़े 31.4 करोड़ डॉलर की रिकवरी के विवाद के बीच केयर्न इंडिया ने अनुबंध क्षेत्र के लिए उत्पादन भागीदारी करार (पीएससी) का 10 साल के लिए विस्तार करने की मांग पेट्रोलियम मंत्रालय से की है।
रावा पीएससी की शर्तों के मुताबिक सरकार की ओर से अनुबंध पांच साल से अधिक की अवधि के लिए नहीं बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, गैस एसोसिएटेड प्राकृतिक गैस (एनएएनजी) के व्यावसायिक उत्पादन की स्थिति में अनुबंध को 10 साल की अवधि तक के लिए बढ़ाया जा सकता है।