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कोल ब्लॉक रद्द होने से नहीं आएगा बिजली संकट
नई दिल्ली /सुजय मेहदूदिया
Updated Fri, 05 Sep 2014 09:17 PM IST
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केंद्र सरकार ने जिन 46 कोल ब्लॉकों के आवंटन को रद्द न करने की मांग की है, उन कोल ब्लॉकों के स्टेटस और वैधता की जांच अगर सुप्रीम कोर्ट करता है, तो भी देश में संकट जैसी कोई स्थिति उत्पन्न नहीं होने वाली है।
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तथ्य यह है कि ये कैप्टिव माइन देश के कुल कोयला उत्पादन में मात्र 7 फीसदी का योगदान करते हैं। इसके अलावा ये कैप्टिव माइन 2013-14 की अवधि के लिए तय किए गए उत्पादन के लक्ष्य को पूरा करने में भी असफल रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) देश के कुल कोयला उत्पादन में 80 फीसदी योगदान करता है और शेष कोयले में से कुछ योगदान आयातित कोयले का है।
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हाल के दिन में निजी क्षेत्र की कंपनियों ने ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास किया है कि अगर कोयला ब्लॉकों को रद्द कर दिया जाता है तो देश में बड़े पैमाने पर बिजली और कोयले का संकट उत्पन्न हो जाएगा। इसका अर्थव्यवस्था पर बेहद खराब असर दिखाई देगा।
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यह सही है कि सरकारी और निजी क्षेत्र के बैंकों ने इन कोल ब्लॉकों में बड़े पैमाने पर निवेश किया है लेकिन सच यह है कि आवंटन के वर्षों बाद भी ज्यादातर कोल ब्लॉकों में उत्पादन नहीं हो रहा है और कैप्टिव माइनर्स पैसा बनाने के लिए प्रीमियम का इंतजार कर रहे हैँ।
कोयला मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि अगर सीआईएल को असक्षम और भ्रष्ट करार दिया जा रहा है तो कैप्टिव माइनर्स की स्थिति भी अच्छी नहीं है। कैप्टिव माइनर्स ने 2013-14 में मात्र 39 मिलियन टन (एमटी) यानी 390 लाख टन कोयले का उत्पादन किया है जबकि उनके लिए कोयला उत्पादन का लक्ष्य 50 एमटी तय किया गया था। कुल कैप्टिव ब्लॉकों में से 40 ब्लॉकों में उत्पादन चल रहा है जबकि 6 ब्लॉकों में उत्पादन मौजूदा वित्त वर्ष में शुरू होने की उम्मीद है।
सुप्रीम कोर्ट ने 46 कोल ब्लॉकों के काम काज और उत्पादन तंत्र पर स्टेटस रिपोर्ट मांगी है और इस रिपोर्ट को देखने के बाद 9 सितंबर को इस पर आदेश जारी कर सकता है। कोयला मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि इन कोल ब्लॉकों के लीज धारक अवैध तरीके से आवंटित माइन्स से हजारों करोड़ रुपये का लाभ उठा चुके हैं। ऐसे में इन लीज धारकों को अवैध तरीके से आवंटित माइन्स से मिले लाभ के कानूनी नतीजों का सामना करना चाहिए।
सूत्रों का कहना है कि जहां तक अर्थव्यवस्था का संबंध है, सुप्रीम कोर्ट के कदम का सकारात्मक प्रभाव होगा। पहला इससे सरकार को स्पष्ट संदेश जाएगा कि वह अर्थव्यवस्था के एक अहम सेक्टर को अपने कुप्रबंधन, पक्षपात और भ्रष्टाचार द्वारा नष्ट नहीं कर सकती है।
दूसरे, इससे अच्छे बिजनेस मॉडल और देश में ईमानदारी से कारोबार करने की इच्छा रखने वाली वास्तविक कंपनियां प्रोत्साहित होंगी। इससे ऐसी कंपनियां हतोत्साहित होंगी, जिनकी विशेषज्ञता सिर्फ सिस्टम को तोड़ने मरोड़ने में है। तीसरी और सबसे अहम बात, इससे कोयला सेक्टर में स्पष्टता, पारदर्शिता, प्रभावी क्षमता और सुधार आएगा।
अपनी तमाम अक्षमताओं के साथ कोल इंडिया अब भी देश के कुल कोयला उत्पादन का 80 फीसदी उत्पादन करता है और देश के 86 थर्मल पावर प्लांट में से 82 को कोयले की आपूर्ति करता है। अगर सभी लीज को रद्द कर दिया जाए तो गंभीर कंपनियां इन ब्लॉकों के लिए बोली लगाएंगी। ये कंपनियां नीलामी में किए गए निवेश के कारण प्रभावी तरीके से कोल ब्लॉक में खनन करेंगी।
नीलामी प्रक्रिया से राज्य सरकारों को बड़े पैमाने पर राजस्व मिलेगा और इसका इस्तेमाल इन राज्यों में सामाजिक आर्थिक विकास में किया जा सकेगा। नई सरकार में ऊर्जा और कोयला मंत्रालय कोल ब्लॉकों के आवंटन के लिए एक कार्ययोजना के साथ तैयार हैं।
वास्तव में इसे नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार द्वारा सिस्टम से भ्रष्टचार खत्म करने और प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन में पारदर्शिता लाने के अवसर के तौर पर देखा जा जा रहा है।
इससे केंद्र सरकार के लिए पुराने और भ्रष्ट सिस्टम को हटा कर पारदर्शी और प्रभावी सिस्टम लाकर कोयला सेक्टर में सुधारों को आगे बढ़ाना आसान होगा। इससे सरकार खनन के क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए खोलने और कोल इंडिया और इसकी सब्सिडियरी के काम काज के तौर तरीकों में सुधार करने की पहल भी कर सकेगी।