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इफको ने सुझाए सब्सिडी घटाने के उपाय

Thu, 17 Jan 2013 10:38 PM IST
नई दिल्ली/हरवीर सिंह
नई दिल्ली/हरवीर सिंह Updated Thu, 17 Jan 2013 10:38 PM IST
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need to increase urea price says iffco

कृषि उत्पादन के लिए सबसे अहम उर्वरकों के मोर्चे पर सरकार के फैसले लेने की ढील के चलते कंपनियों को मिलने वाली सब्सिडी का बकाया 22,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। साल की तीन माह की बकाया अवधि में यह 33,000 करोड़ रुपये पर पहुंच जाएगा।

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चालू वित्त वर्ष (2012-13) के लिए 65,000 करोड़ रुपये की उर्वरक सब्सिडी का बजटीय प्रावधान किया गया है। इस हालत में उद्योग ने सरकार को सुझाव दिया है कि यूरिया की कीमतों में 750 रुपये प्रति टन की बढ़ोतरी, डीएपी की कीमत व एमओपी पर कंसेशन और कीमत में कमी के साथ एक साल तक डीएपी और यूरिया के आयात पर सब्सिडी बंद करने से करीब 22,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी की बचत हो सकती है।
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जबकि उद्योग डीएपी की कीमत में 1,000 रुपये और एमओपी की कीमत में 1,500 रुपये प्रति टन कटौती को तैयार है। इसके चलते किसान पर भी किसी तरह का अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा। देश की सबसे बड़ी उर्वरक उत्पादक और करीब 22 फीसदी उर्वरक विपणन हिस्सेदारी रखने वाली सहकारी संस्था इंडियन फॉरमर्र्स फर्टिलाइजर को-आपरेटिव लिमिटेड (इफको) के मैनेजिंग डायरेक्टर उदय शंकर अवस्थी ने अमर उजाला को बताया कि सरकार इन उपायों पर अमल करती है तो उससे उद्योग और किसान दोनों का फायदा होने के साथ ही सरकार उर्र्वरक सब्सिडी में बचत कर सकेगी।
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उन्होंने बताया कि 1 जनवरी को देश में 60 लाख टन डीएपी और एनपीके उर्वरकों का स्टॉक है। एक साल तक देश की जरूरत को पूरा करने के  लिए इनके आयात की जरूरत नहीं है। इसलिए सरकार को इनके आयात पर एक साल के लिए सब्सिडी बंद कर देनी चाहिए। चालू साल में 15 जनवरी तक 57.7 लाख टन डीएपी और चार लाख टन एमओपी का आयात किया गया था। सरकार इन पर 14,100 रुपये प्रति टन की सब्सिडी देती है। एक साल तक सब्सिडी बंद करने से उसे 8,700 करोड़ रुपये की बचत होगी।

वहीं सालाना हम करीब 80 लाख टन यूरिया आयात करते हैं। देश की जरूरत के 15 फीसदी आयात पर ही सरकार को सब्सिडी देनी चाहिए। इसके चलते करीब 50 लाख टन यूरिया आयात पर सरकार की सब्सिडी बच जाएगी क्योंकि देश में सालाना करीब 80 लाख टन यूरिया आयात हो रहा है इसका बड़ा हिस्सा कृषि के अलावा दूसरे उद्योगों में जा रहा है। आयातित यूरिया पर सरकार 18,000 रुपये प्रति टन की सब्सिडी दे रही है। पचास लाख टन पर सब्सिडी बंद करने से उसे 9,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी बचत होगी।

वहीं घरेलू मोर्चे पर सरकार यूरिया कीमत में 750 रुपये प्रति टन की कीमत बढ़ोतरी कर सकती है। साथ ही डीएपी और एमओपी पर कंसेशन (सब्सिडी) में 1,000 रुपये प्रति टन की कमी कर सकती है। किसानों पर यूरिया कीमत में बढ़ोतरी का असर नहीं होगा क्योंकि उद्योग डीएपी की कीमत 1,000 रुपये और एमओपी की कीमत 1,500 रुपये प्रति टन घटाने को तैयार है। लेकिन सरकार को 4,700 करोड़ रुपये की सब्सिडी बचत होगी। इस पूरी कवायद में सरकार को करीब 22,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी बचत होगी। जो इस समय उस पर उद्योग की बकाया सब्सिडी के आसपास बैठती है।


अवस्थी का कहना है कि चालू साल में अगर सब्सिडी बजट 33,000 करोड़ रुपये बढ़ता है तो यह बचत उसके लिए काफी फायदेमंद होगी। इससे उद्योग को भी राहत मिलेगी क्योंकि सरकार द्वारा सब्सिडी भुगतान नहीं करने से उद्योग बैंकों से पैसा ले रहा है और अप्रत्यक्ष रूप से उद्योग की बजाय ब्याज के रूप में सब्सिडी बैंकों को मिल रही है। अगर मौजूदा स्थिति कायम रहती है तो उद्योग की हालत खराब होगी और उसके बाद किसानों और कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।


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