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कर्ज रिस्ट्रक्चरिंग की बढ़ती मांग ने बढ़ाई टेंशन
अमर उजाला, दिल्ली
Updated Mon, 16 Dec 2013 12:57 PM IST
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बैंकों के कर्ज डूबने की बढ़ती तादाद ने वित्त मंत्रालय की चिंता बढ़ा दी है, जिसे देखते हुए वित्त मंत्रालय ने खास तौर से ऐसे मामले जो कि बैंकों के पास रिस्ट्रक्चरिंग के लिए आ रहे हैं, उनकी समीक्षा करने को कहा है।
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साथ ही रिस्ट्रक्चरिंग (कर्ज पुनर्गठन) की संख्या को देखते हुए बैंकों को यह भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि रिस्ट्रक्चरिंग करने में किसी भी तरह की अनदेखी का मामला आने पर उसके परिणाम बैंक को भुगतने पड़ेंगे।
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वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अमर उजाला को बताया कि जिस तरह से रिस्ट्रक्चरिंग के लिए आवेदन आ रहे हैं उससे इस बात का भी अंदेशा है कि कई कंपनियां या कारोबारी आर्थिक सुस्ती का हवाला देकर कर्ज में छूट लेने का प्रयास कर रहे हैं।
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इसे देखते हुए बैंकों को साफ तौर पर कहा गया है कि अगर नियमों में अनदेखी की बात सामने आती है, तो कंपनी के साथ-साथ बैंक को भी इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा।
अधिकारी के अनुसार कॉरपोरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग (सीडीआर) सेल में सितंबर तक कुल 431 मामले स्वीकृत हो चुके हैं। जिन पर 2,72,286 करोड़ रुपए का ऐसा कर्ज हैं, जो कंपनियां बैंकों को नहीं चुका पा रही हैं।
कंपनियों द्वारा कर्ज न चुकाने का मामला अभी तक का रिकॉर्ड है। इसमें से सितंबर तक 1,96,267 करोड़ रुपए के मामले रिस्ट्रक्चरिंग की कवायद में हैं।
अधिकारी के अनुसार सीडीआर सेल के आवेदन और दूसरे मामलों में कर्ज पुनर्गठन के आवेदनों की संख्या को देखते हुए वित्त मंत्रालय पूरे मामले को लेकर काफी सतर्क है। ऐसे में इसी तरह मामले बढ़ते रहे तो बैंकों की सेहत पर काफी प्रतिकूल असर पड़ेगा।
कॉरपोरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग सेल के सितंबर 2013 तक के आंकड़ों के अनुसार बैंकों का कर्ज चुकाने में नाकाम हो रही कंपनियों में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी आयरन एवं स्टील सेक्टर, इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्सटाइल सेक्टर के कंपनियों की है।
आंकड़ों के अनुसार आयरन और स्टील क्षेत्र की 46 कंपनियां, इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की 20 कंपनियां, टेक्सटाइल क्षेत्र की 47 कंपनियां और पावर सेक्टर की 13 कंपनियां सूची में शामिल हैं।