जानिए, आम बजट में आपको क्या-क्या मिलेगा?
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वित्त मंत्री अरुण जेटली बृहस्पतिवार को जब अपना पहला आम बजट पेश करेंगे तो उनके पास आम लोगों और उद्योग को टैक्स छूट मुहैया कराने की गुंजाइश बेहद कम होगी।
बढ़ते राजकोषीय घाटे, राजस्व संग्रह में कमी, देश भर में सूखे की आशंका, बढ़ती महंगाई और खाद्य वस्तुओं के दामों में इजाफे की वजह से उनके हाथ बंधे होंगे। इसके साथ ही उन्हें नौकरियां पैदा करने और रोजगार बढ़ाने के साथ किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्यों में बढ़ोतरी के वादों को पूरा करते भी दिखना होगा।
बहरहाल, अर्थव्यवस्था की खराब हालत और केंद्रीय प्राप्तियों में गिरावट को देखते हुए मोदी सरकार की ओरसे कड़वी गोली दिए जाने की आशंका है।
लिहाजा आम लोगों को आयकर में छूट के तौर पर मिलने वाली राहत की तो न तो संभावना दिखती और न ही इसकी उम्मीद की जानी चाहिए। लेकिन मोदी सरकार पर चुनाव के दौरान अच्छे दिन आने वाले हैं नारे के तहत किए गए वादों को पूरा करने का भी पूरा दबाव रहेगा।
किन पर लगेगा ज्यादा टैक्स?
सरकार लोगों को वित्तीय तौर पर राहत देने के दबाव में रहेगी। लिहाजा आय कर में दो लाख रुपये तक की छूट में थोड़ा और इजाफा हो सकता है। लेकिन मध्यवर्ग जिस राहत का इंतजार कर रहा है वह है 80 सी के तहत दी जाने वाली कर छूट को एक लाख रुपये से बढ़ा कर डेढ़ से दो लाख रुपये किया जाना।
इससे मध्यवर्ग को बचत के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। सरकार बजट में कॉरपोरेट टैक्स बढ़ाने और बेहद अमीरों के लिए नए टैक्स स्लैब का विकल्प आजमा सकती है। इस समय देश में 42,800 ऐसे लोग हैं, जिनकी कर योग्य आय एक करोड़ रुपये से ज्यादा है।
उन्हें दस फीसदी सरचार्ज भी देना पड़ता है। विशेषज्ञों की राय है सरकार के लिए एक लाख रुपये तक की कर छूट सीमा को बढ़ाना संभव नहीं होगा क्योंकि इससे उसे 30,000 करोड़ रुपये की राजस्व हानि हो सकती है।
ऐसे समय सरकार यह बरदाश्त नहीं कर सकती क्योंकि इससे करदाताओं की संख्या कम हो जाएगी। यह करदाताओं की संख्या में इजाफे की अवधारणा के खिलाफ होगा। हां, बुजुर्गों और महिलाओं को आय कर के मोर्चे पर कुछ छूट मिल सकती है। उनके लिए टीडीएस छूट का दायरा बढ़ाया जा सकता है।
वित्त मंत्री खेलेंगे कौन सा दांव?
जेटली मेडिकल इंश्योरेंस और हाउसिंग लोन पर ज्यादा ध्यान दे सकते हैं और इस मद में टैक्स छूट बढ़ाए जाने की संभावना है। हालांकि, पद संभालने के बाद से ही मोदी और उनके वरिष्ठ मंत्री लोगों की उम्मीदों को कम करने की कोशिश में लगे हैं।
सरकार की ओर से लगातार राजकोषीय प्रबंधन को मजबूत करने की बात कही जाती रही है। अगर देश में सूखे की मार पड़ती है तो इसके लिए आकस्मिक फंड की व्यवस्था करनी होगी। सूखे की स्थिति में कीमतों पर दबाव रहेगा और इससे महंगाई बढ़ेगी। जाहिर है इससे सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ेगा।
वित्त वर्ष 2013-14 के दौरान राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4.5 फीसदी था। यह 4.6 फीसदी के लक्ष्य से थोड़ा ही कम था। वित्त वर्ष 2014-15 के दौरान राजकोषीय घाटा जीडीपी के 4.1 फीसदी तक आ जाने की संभावना है।
राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 2014-15 के निर्धारित लक्ष्य के आधे तक पहुंच गया है, जबकि नए वित्त वर्ष का दो ही महीना पूरा हुआ है। इसके साथ ही सरकार को भारतीय अर्थव्यवस्था की रेटिंग पर अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों के रुख का भी अंदाजा है।
ज्यादा नौकरियां पैदा करने पर होगा जोर
मोदी सरकार विकास दर बढ़ाने और ज्यादा नौकरियां पैदा करने का नारा देकर सत्ता में आई है। लिहाजा जेटली को अपने बजट में इसका रोड मैप पेश करना होगा। सरकार का 90 फीसदी राजस्व भोजन, पेट्रोलियम और फर्टिलाइजर सब्सिडी के अलावा मनरेगा जैसी सामाजिक योजनाओं पर खर्च होना है।
रेटिंग एजेंसी एडिलविस के मुताबिक वित्त वर्ष 2013-14 के दौरान आयकर ने जीडीपी में 2.1 फीसदी का योगदान दिया था। यह रकम सरकार की ओर भोजन, ईंधन और फर्टिलाइजर सब्सिडी में खर्च की जाने वाली रकम के बराबर है। इस बार के बजट में कृषि और सिंचाई पर खासा जोर दिए जाने की संभावना है।
बजट में जीएसटी (गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स) लागू करने का रोडमैप पेश किए जाने की संभावना है। इसमें सारे केंद्रीय करों को मिला दिया जाएगा और इसमें से राज्य और केंद्र दोनों को बराबर-बराबर हिस्सा मिलेगा। डायरेक्ट टैक्स कोड (डीटीसी) की संभावनाओं पर भी बजट में संकेत होंगे। इसे बदलते समय के माकूल नहीं माना जा रहा है।
सिगरेट होगी महंगी
बजट में पेट्रोलियम सेक्टर में बड़े सुधार की घोषणा हो सकती है। जेटली का लक्ष्य पेट्रोलियम सब्सिडी से छुटकारा पाना रहेगा और वह पूरे देश में लागू होने वाली डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) की शुरुआत की घोषणा कर सकते हैं।
बजट में प्रमुख सेक्टरों में इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने पर जोर होगा। इससे औद्योगिक इलाकों का निर्माण होगा और रोजगार पैदा होंगे। इससे सप्लाई चेन की अड़चनें भी दुरुस्त होगी और आगे चल कर इसका लाभ कृषि सेक्टर को मिलेगा।
कर, श्रम और भूमि अधिग्रहण से जुड़े कानूनों में सुधार इस पहल का हिस्सा होंगे। सरकार बड़ी तादाद में उपभोक्ताओं पर असर डालने वाले अप्रत्यक्ष करों में भी बदलाव की घोषणा कर सकती है।
वित्त मंत्री सोने के आयात पर ड्यूटी घटाने का ऐलान कर सकते हैं। इस समय इस पर दस फीसदी ड्यूटी लगाई जा रही है। दरअसल चालू खाते के घाटे को कम करने के लिए सोने के आयात पर ड्यूटी बढ़ाई गई थी। सिगरेट पर उत्पादक शुल्क 15 से 20 फीसदी तक बढ़ाया जा सकता है। अन्य तंबाकू उत्पाद भी महंगे होगे।