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पावर सेक्टर को सुधारने की तैयारी में सरकार

Sat, 04 Oct 2014 09:05 AM IST
नई दिल्ली/ सुजय मेहदूदिया
नई दिल्ली/ सुजय मेहदूदिया Updated Sat, 04 Oct 2014 09:05 AM IST
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Integrated development of power, coal and renewable energy, Participation of international miners

कोल ब्लॉकों का आवंटन रद्द किए जाने के चलते देश में कोयले की आपूर्ति का संकट न खड़ा होने देने को लेकर सरकार कई स्तरों पर कदम बढ़ाती दिख रही है। इसके लिए सरकार ने एक ओर, जहां सरकारी कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) पर कोयला उत्पादन बढ़ाने का दबाव बनाया हुआ है। वहीं, दूसरी ओर भूमिगत खानों से ज्यादा से ज्यादा कोयले के खनन के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर की कोयला उत्खनन की तकनीक को इस्तेमाल में लाने को लेकर भी गंभीरता से विचार किया जा रहा है। इसके लिए सरकार इस क्षेत्र में अमेरिका और आस्ट्रेलिया की तकनीकी विशेषज्ञता का इस्तेमाल देश में करने की ओर कदम बढ़ा रही है।

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बिजली, कोयला और नवीकरणीय ऊर्जा के समेकित विकास को लेकर गठित सलाहकार समूह ने अपनी हालिया बैठक में अमेरिका और आस्ट्रेलियाई विशेषज्ञों की मदद से देश में भूमिगत खानों से कोयले कोयला उत्पादन बढ़ाने के उपायों पर गहन विचार-विमर्श किया है। इस बैठक में कोयला क्षेत्र के नामचीन विशेषज्ञ रोलैंड के हाइट ने टेली कांफ्रेंसिंग के जरिए अमेरिका के फ्लोरिडा से भाग लिया।
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रोलैंड ने बताया कि चीन में करीब 90 फीसदी कोयले का उत्पादन भूमिगत खानों से ही किया जाता है। उन्होंने इसकी तकनीकी पहलू की जानकारी देते हुए बताया कि आठ से अधिक का स्ट्रिप रेशियो रखकर चीन में भूमिगत उत्खनन को खुली खदानों से कोयला उत्पादन से ज्यादा बनाया गया है।
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रोलैंड के मुताबिक यदि भारत माइन-डेवलप-ऑपरेट (एमडीओ) रूट के जरिए पर्याप्त संख्या में भूमिगत कोयला खानों के उत्खनन का प्रस्ताव दे, तो अच्छी खासी संख्या में अंतरराष्ट्रीय स्तर के उत्खननकर्ता इसमें अपनी रुचि दिखा सकते हैं। उनकी दरें भी काफी प्रतिस्पर्धी होंगी। यह खुली खदानों से कोयला निकालने जितनी सस्ती हो सकती हैं।

देश में पवन ऊर्जा के विकास के लिए भी एक अंतरराष्ट्रीय कंसल्टेंट से परामर्श किया गया है। यह बातचीत लक्षद्वीप और अंडमान द्वीपों पर पवन ऊर्जा के उत्पादन को लेकर की गई है। इससे इन द्वीपों पर डीजल आधारित बिजली उत्पादन से कम लागत में बिजली उपलब्ध कराई जा सकेगी।

फिलहाल पवन ऊर्जा के जरिए प्रति किलोवाट बिजली बनाने की लागत 11 रुपये से 15 रुपये के बीच बैठती है। इसकी वजह पवन ऊर्जा बनाने के उपकरणों का महंगा होना है। सलाहकारों का कहना है कि विंड टर्बाइन व अन्य चीजों का घरेलू स्तर पर उत्पादन कर इस लागत को घटाकर 6 से 7 रुपये प्रति किलोवाट पर लाया जा सकता है।

ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल द्वारा गठित सलाहकार समिति ने ऊर्जा मंत्रालय से कहा है कि बिजली के ट्रांसमिशन में आने वाली सभी बाधाओं को दूर किया जाए। साथ ही ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव के उपायों को समयबद्ध ढंग से लागू किया जाए। इसमें पोसोको को एक स्वतंत्र कंपनी में बदलने की बात भी शामिल है। देश में ग्रिड के संचालन को देखने वाली पोसोको फिलहाल पावर ग्रिड की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी के रूप में काम कर रही है।

इसके अलावा सलाहकार समूह ने यह भी पाया है कि देश के बिजली क्षेत्र में सुधार के लिए राज्य स्तर पर मजबूत ट्रंासमिशन सिस्टम विकसित किए जाने की सख्त जरूरत है। ऐसा करके ही राष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत ट्रांसमिशन सिस्टम को पूरी तरह कारगर बनाया जा सकता है।


समूह ने पाया कि वर्तमान में नेशनल ट्रांसमिशन सिस्टम में कई तरह की कमियां राज्य स्तर पर ट्रांसमिशन में खामियों के चलते बनी हुई हैं, जिन्हें दूर किया जाना जरूरी है। इसके अलावा समूह ने बिजली के ट्रांसमिशन सिस्टम संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए पांच से सात साल की एडवांस प्लानिंग के साथ चलने की जरूरत भी जताई है, ताकि उत्पादित होने वाली बिजली की आपूर्ति में ट्रांसमिशन के स्तर पर कमियों के चलते बाधा न आने पाए।

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