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पॉलिसी पैरालीसिस से तूफानी सुधारों तक
अवनीश पाठक
Updated Thu, 27 Dec 2012 09:13 AM IST
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2012 का साल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए पॉलिसी पैरालीसिस से तूफानी सुधारों तक का साल रहा। वर्ष के आरंभ में वित्तमंत्री के रूप में अर्थव्यवस्था की कमान प्रणब मुखर्जी के हाथों में थी।
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जुलाई में वे राष्ट्रपति चुने गए और पी चिदंबरम ने वित्त मंत्रालय की कमान संभाली। इसके बाद ताबड़तोड़ सुधारों का दौर चला। मल्टी ब्रांड रिटेल के दरवाजे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए खोल दिए गए।
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सिंगल ब्रांड रिटेल में 100 फीसदी विदेशी निवेश की इजाजत दे दी गई। विदेश निवेश के लिए एवियेशन और पेंशन क्षेत्रों को भी खोला गया। बीमा क्षेत्र में निवेश की सीमा बढ़ा दी गई।
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साल की शुरुआत हुई तो यूरोप में छाई मंदी का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा था। अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने भारत की क्रेडिट रेटिंग कम करके उद्योग जगत को कई बार परेशान किया।
हालांकि आम आदमी के लिए इन सभी से ज्यादा पीड़ादायी रही- महंगाई। महंगाई दर इस वर्ष 9 फीसदी के पार चली गई। सरकार ने रियायती सिलेंडरों की संख्या 6 तक सीमित कर वर्ष के आम आदमी के जले पर नमक छिड़क दिया।
आर्थिक क्षेत्र में भारत ने और क्या बदलाव देखे साल 2012 में, आइए लेते हैं जायजा-