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छह साल में छह गुना बढ़ा भारतीय कंपनियों का कर्ज

Tue, 27 Aug 2013 12:02 AM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
नई दिल्ली/ब्यूरो Updated Tue, 27 Aug 2013 12:02 AM IST
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indian companies debt increased

गिरावट के नए रिकॉर्ड बना रहे रुपये ने कॉरपोरेट जगत और बैंकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

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पिछले एक साल के दौरान देश के 10 प्रमुख औद्योगिक समूहों का कर्ज 15 फीसदी बढ़कर 6.31 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। जबकि 6 साल पहले यह करीब एक लाख करोड़ रुपये था।

इस कर्ज का बड़ा हिस्सा डॉलर में लिया गया है, जो कंपनियों के साथ-साथ बैंकों को भी मुसीबत में डाल सकता है।

भारतीय बैंकों ने अपनी विदेशी शाखाओं के जरिए जमकर डॉलर में कर्ज बांटा है, जिसके डिफाल्ट का खतरा बढ़ गया है। मार्च तक बड़े कॉरपोरेट समूहों को करीब एक लाख करोड़ रुपये का कर्ज चुकाना है।
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मॉर्गन स्टेनली की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय बैंकों का करीब 20 फीसदी कर्ज डॉलर में बंटा हुआ है। रुपये के मुकाबले डॉलर के मजबूत होने से देनदारों पर इसका ज्यादा बोझ पड़ेगा।
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पिछले तीन महीने के दौरान डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 17 फीसदी कमजोर हुआ है। वर्ष 2009 में भारतीय कंपनियों पर विदेशी कर्ज 118 अरब डॉलर था, जो वर्ष 2013 में बढ़कर 224 अरब डॉलर हो गया है।

कंपनियों पर विदेशी कर्ज का बोझ बढ़ाने में सरकारी नीतियों का भी बड़ा हाथ है। हाल के वर्षों में सरकार ने विदेशी उधारी की राह आसान बना दी है। इसी का नतीजा है कि देश के कई बड़े समूहों का 40-60 फीसदी कर्ज डॉलर में है।

बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि रुपये की कमजोरी का असली असर आगामी मार्च में दिखेगा। भारतीय कंपनियों को एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज चुकाना है। इंफ्रास्ट्रक्चर और एविएशन से जुड़ी कंपनियां पहले ही कर्ज चुकाने में नाकाम हो रही हैं।

पिछले तीन साल में सरकारी बैंकों का एनपीए बढ़कर दोगुना हो चुका है। इसे बढ़ाने में 30 बड़े औद्योगिक समूह का सबसे ज्यादा हाथ है। देश में बैंकों के जरिए बंटे कर्ज का 13 फीसदी इन समूहों को मिला है।


ग्लोब कैपिटल के अर्थशास्त्री केके मित्तल का कहना है कि अगले छह महीने से लेकर साल भर तक शार्ट टर्म विदेशी कर्ज चिंता का विषय रहेगा।

फंस सकता है विदेशी शाखाओं से बंटा कर्ज
भारतीय बैंकों ने अपनी विदेशी शाखाओं के जरिए डॉलर में कर्ज देने में जो तेजी दिखाई है, उसे लेकर वित्त मंत्रालय में चिंता बढ़ती जा रही हैं।

मंत्रालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि रुपये में आई तेज गिरावट के बाद इस कर्ज को लेकर फिक्र बढ़ गई है। साथ ही बैंकों ने जिन चुनिंदा कंपनियों को ज्यादातर कर्ज दिया, उसे लेकर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।

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