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कारोबारी सहयोग बढ़ाकर ग्लोबल धुरी बन सकते हैं भारत-चीन

Mon, 16 Jun 2014 03:48 PM IST
प्रदीप एस मेहता, महासचिव, कट्स इंटरनेशनल/ नई दिल्ली
प्रदीप एस मेहता, महासचिव, कट्स इंटरनेशनल/ नई दिल्ली Updated Mon, 16 Jun 2014 03:48 PM IST
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india-China can become a global axis extending business cooperation

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और अन्य तनावों के बावजूद पिछले एक दशक में दोनों देशों के बीच कारोबार में कई गुनी भारी बढ़ोतरी हुई है।

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भारत और चीन के बीच 2004 में जहां महज 7 अरब डॉलर का कारोबार था, वहीं 2013 में यह बढ़कर 65 अरब डॉलर पर पहुंच गया। अगले साल (2015) में इसके बढ़कर 100 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। हालांकि इससे जुड़ा हुआ एक दूसरा पहलू यह है कि इस द्विपक्षीय कारोबार का तराजू लगातार चीन की ओर ही झुका हुआ है। इसमें भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ता ही जा रहा है, जो 2013 में 31 अरब डॉलर के स्तर पर रहा।
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चीन के साथ भारत का यह व्यापार घाटा घाना जैसे कई देशों की कुल राष्ट्रीय आय से भी अधिक है। ऐसे में इस व्यापार घाटे को कम किया जाना बहुत जरूरी है क्योंकि स्वस्थ कारोबार के लिए एक सीमा से अधिक घाटा और ट्रेड सरप्लस दोनों ही नुकसानदेह साबित होते हैं।
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चीन के साथ कारोबार में भारत के व्यापार घाटे के कई कारण हैं, जिन्हें समझना जरूरी है। इसकी सबसे प्रमुख वजह चीन द्वारा भारी मात्रा भारत को तैयार माल (फिनिश्ड प्रोडक्ट) का निर्यात किया जाना है, जबकि वह भारत से ज्यादातर खनिज, कपास, सूत और रत्न जैसे कच्चे माल की श्रेणी में आने वाली चीजों का ही आयात करता है। इसके अलावा उत्पादों पर कर और अन्य मंजूरियों से जुड़े मामले भी व्यापार को प्रभावित कर रहे हैं।

मिसाल के तौर पर बिजली उपकरण बनाने वाली भारतीय कंपनियों को चीन में 20 से 30 फीसदी की ऊंची दर से कर अदा करना होता है। दूसरी ओर भारतीय दवा कंपनियों के लिए चीन में सरकारी मंजूरी संबंधी दिक्कतों के चलते माल बेच पाना काफी मुश्किल है। भारत और चीन को इन सारे मुद्दों को आपसी बातचीत के जरिए हल करके एक दूसरे के यहा निवेश को बढ़ावा देना चाहिए।

भारत अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में बेहतर रिटर्न की संभावनाओं के दम पर चीन से इस क्षेत्र के लिए अच्छा निवेश हासिल कर सकता है, जिसकी देश को जरूरत भी है। इसके अलावा भारत और चीन साझा उपक्रम लगाकर और तकनीकी सहयोग को आगे बढ़ाकर आपसी कारोबार को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकते हैं।

ऐसा करके ऊर्जा और जल खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं। इसके अलावा रिसर्च और डेवलपमेंट के क्षेत्र में भी एशिया के यह दोनों दिग्गज एक साथ मिलकर काफी आगे बढ़ सकते हैं। भारत अपने यहां आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ा कर कारोबार में अपनी स्थिति को बेहतर कर सकता है।


दोनों देशों को यह समझना होगा कि वह इस वक्त एक ऐसे दौर में खड़े हैं, जब एक दूसरे के साथ सहयोग करके वह काफी तेजी से आगे बढ़ सकते हैं और मिलकर आगे बढ़ते हुए वह ग्लोबल कारोबार में एक महत्वपूर्ण मुकाम हासिल कर सकते हैं।

भारत और चीन आपसी सहयोग से दुनिया में अपनी स्थिति इतनी मजबूत बना सकते हैं कि वह दूसरों के बनाए नियमों का पालन करने के बजाय खुद ग्लोबल कारोबार के लिए नए नियम व मानदंड स्थापित करने की स्थिति में आ जाएं। ऐसा संभव है कि मौजूदा हालात में बड़े बदलाव के साथ 2013 तक ग्लोबल अर्थव्यवस्था की धुरी भारत और चीन के बीच स्थित हो जाए।

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