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खत्म होगी आयात आधारित मूल्य निर्धारण प्रणाली
नई दिल्ली/ सुजय मेहदूदिया
Updated Tue, 09 Dec 2014 09:03 AM IST
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केंद्र की मोदी सरकार देश के पेट्रोलियम सेक्टर में सुधारों को तेजी के साथ आगे बढ़ाने की तैयारी में है। सुधारों के तहत पेट्रोल और डीजल की कीमतों को नियंत्रण मुक्त किए जाने के बाद अब द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) और मिट्टी के तेल (केरोसिन) की सब्सिडी और वितरण प्रणाली में व्यापक बदलाव की रूपरेखा तैयार की जा रही है।
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इसके तहत वित्त मंत्री अरुण जेटली जल्द ही तेल व गैस की आयात आधारित मूल्य निर्धारण प्रणाली (आईपीपी) को खत्म करने की घोषणा कर सकते हैं। उल्लेखनीय है कि आईपीपी की गणना पद्धति को पारदर्शी नहीं माना जाता है जिसके चलते बदलाव की तैयारी चल रही है।
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सरकार द्वारा पेट्रोलियम उत्पादों की आयात सम मूल्य निर्धारण प्रणाली को खत्म करने का असर इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी), हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) और मंगलौर रिफाइनरी एंड पेट्रोकैमिकल्स लिमिटेड (एमआरपीएल) जैसी सरकारी तेल कंपनियों की मार्जिन पर पड़ेगा।
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मामले से जुड़े सूत्रों का बताना है कि पेट्रोलियम एवं गैस मंत्रालय के कड़े विरोध के बावजूद मूल्य निर्धारण की प्रणाली में बदलाव के प्रस्ताव पर वित्त मंत्रालय में व्यापक स्तर पर चर्चा की गई है। वित्त मंत्रालय का मानना है कि आगामी आम बजट में अगर आईपीपी को खत्म करने की घोषणा नहीं की जाती है, तो सरकारी तेल विपणन कंपनियों के लिए आगे चलकर भारी संकट खड़ा हो सकता है।
डीजल की कीमतें सरकारी नियंत्रण से मुक्त होने बाद निजी कंपनियों के लिए खुदरा बिक्री के बाजार में कूदने के द्वारा खुल जाएंगे और यह कंपनियां सरकारी कंपनियों को कड़ी टक्कर दे सकती हैं। सरकार मूल्य निर्धारण में बदलाव की यह तैयारी ऐसे समय में कर रही है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें घटकर पांच साल के सबसे निचले स्तर 67 रुपये प्रति बैरल तक आ गई हैं।
वित्त मंत्रालय के सूत्रों का बताना है कि तेल एवं गैस की कीमतों के निर्धारण को लेकर 59वीं संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशों को लागू करने पर काफी गंभीरता से विचार किया जा रहा है। यह फैसला वित्त वर्ष 2015-16 के आम बजट की एक अहम घोषणा के रूप में सामने आ सकता है। समिति ने एलपीजी और केरोसिन का मूल्य निर्धारण आईपीपी प्रणाली के बजाय इन उत्पादों की वास्तविक शोधन लागत (एक्चुअल रिफाइनरी कॉस्ट) के आधार पर करने की सिफारिश की है।
दूसरी ओर पेट्रोलियम मंत्रालय वित्त मंत्रालय की इस कवायद का पुरजोर विरोध कर रहा है। पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना है कि देश में तेल की जरूरत का करीब 85 फीसदी आयातित कच्चे तेल से पूरी होती है। ऐसे में तेल कंपनियों की लागत का करीब 90 फीसदी हिस्सा तेल के आयात पर खर्च होता है। इसके अलावा घरेलू बाजार में भी तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय कीमतों से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में आयातित तेल पर देश की निर्भरता को देखते हुए आयात आधारित मूल्य निर्धारण प्रणाली को बदलना वाजिब नहीं होगा।
तेल मंत्रालय का यह भी कहना है कि एक्चुअल रिफाइनरी कॉस्ट और आईपीपी आधारित मूल्य के बीच अकसर काफी कम अंतर ही रहता है। हाल के कुछ वर्षों में देखा जाए, तो तेल कंपनियों की अंडर रिकवरी आईपीपी प्रणाली के तहत एक्चुअल कॉस्ट की तुलना में कम रही है। हालांकि सूत्रों का बताना है कि पेट्रोलियम मंत्रालय के इन तर्कों का कोई असर वित्त मंत्रालय के रुख पर पड़ने की संभावना बहुत कम है और वह आगामी बजट में आईपीपी को खत्म करने की घोषणा करने का मन लगभग बना चुका है।
गौरतलब है कि किरीट पारीख समिति द्वारा अक्तूबर 2013 में तत्कालीन यूपीए सरकार को रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतें अब सरकार के नियंत्रण से मुक्त किए जाने के बावजूद तेल कंपनियों की अंडर रिकवरी की गणना आईपीपी प्रणाली के तहत ही की जाती है। कंपनियों को यह घाटा (अंडर रिकवरी) सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत सस्ती दरों पर दिए जाने वाले केरोसिन और सस्ती दरों पर एलपीजी सिलिंडरों की बिक्री के चलते हो रही है।