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तुरंत समाप्त हो लेवी चीनी की बाध्यता
हरवीर सिंह (सीनियर एडिटर, अमर उजाला)
Updated Wed, 07 Nov 2012 11:08 PM IST
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देश के करीब 45 फीसदी चीनी उत्पादन की हिस्सेदारी वाले सहकारी क्षेत्र का मानना है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन सी. रंगराजन की अध्यक्षता में चीनी उद्योग पर बनी समिति की उन सिफारिशों पर तुरंत फैसला ले लेना चाहिए, जिन पर विवाद नहीं है।
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जबकि उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड और पंजाब जैसे राज्यों में गन्ना आरक्षण और राज्य सरकार द्वारा तय किये जाने वाले राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) जैसे विवादास्पद मुुद्दों पर अभी और विचार किया जाना चाहिए। रंगराजन समिति की रिपोर्ट पर देश के सहकारी चीनी मिलों के संगठन नेशनल फेडरेशन ऑफ को-आपरेटिव शुगर फैक्टरीज लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर विनय कुमार ने अमर उजाला के साथ लंबी बातचीत की। पेश है इस बातचीत के मुख्य अंश।
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चीनी उद्योग पर रंगराजन समिति की रिपोर्ट में की गई सिफारिशों पर सहकारी चीनी उद्योग की क्या राय है?
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सहकारी चीनी क्षेत्र सी. रंगराजन समिति की चीनी उद्योग को नियंत्रण मुक्त करने की सिफारिशों के पक्ष में है। सरकार को चाहिए कि वह इन सिफारिशों पर अमल करते हुए उद्योग पर लागू 10 फीसदी की लेवी चीनी की बाध्यता को तुरंत समाप्त करे।
ऐसा होने से चीनी मिलों द्वारा किसानों को गन्ना मूूल्य का अधिक भुगतान किया जाएगा।
सहकारी चीनी मिलों में किसानों की भागीदारी होती है, इसलिए जो भी मुनाफा बढ़ेगा वह किसान के खाते में ही जाएगा। इसके साथ ही सरकार सब्सिडी को कम करने के लिए राशन में वितरित होने वाली चीनी की कीमत भी बढ़ा सकता है क्योंकि इस समय यह कीमत बाजार से बहुत कम है।
सरकार द्वारा तय लेवी चीनी के दाम उत्पादन लागत से भी कम हैं जिसकी वजह से सरकार को करीब 3,000 करोड़ रुपये की बचत हो रही है, जबकि इसका बोझ चीनी उद्योग पर पड़ रहा है। रंगराजन समिति की सिफारिश है कि जो राज्य पीडीएस के तहत चीनी देना चाहते हैं, वे सीधे बाजार से इसकी खरीद करें और वितरण मूल्य तय करें।
समिति ने खुले बाजार की चीनी की कोटा व्यवस्था समाप्त करने की सिफारिश की है, उस पर आपकी क्या टिप्पणी है?
रिलीज मैकेनिज्म कोई भी मकसद पूरा नहीं कर रहा है, क्योंकि इससे सीधे चीनी मिलों और अप्रत्यक्ष रूप से किसानों पर ही बोझ पड़ता है। रिलीज मैकेनिज्म से मुक्त होने से सहकारी चीनी उद्योग को अपनी वित्तीय स्थिति सुधारने और चीनी के स्टॉक के बेहतर प्रबंध करने में मदद मिलेगी।
सरकारी चीनी क्षेत्र और आखिरकार किसानों के हित में इस बदलाव को जल्द से जल्द और चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना बेहद जरूरी है। सहकारी मिलें किसान का उद्योग है और किसानों का कल्याण तभी सुनिश्चित किया जा सकता है जब उनका उत्पाद बिके और उन्हें समय पर भुगतान मिले। इसलिए एनएफसीएफएन रंगराजन समिति की सिफारिशों का समर्थन करती है, क्योंकि चीनी उद्योग पर यह रोक हटने से उद्योग को सही तरीके से विकसित होने में मदद मिलेगी।
इससे गन्ने और चीनी की कीमतों में अस्थिरता के चलते होने वाला गन्ने की बुवाई में उतार-चढ़ाव थमेगा और चीनी मिलों के लिए अपनी क्षमता बढ़ाने, आधुनिकीकरण और नए क्षेत्र में जाने का रास्ता खुलेगा।
लेकिन गन्ना मूल्य का जो फार्मूला समिति ने सुझाया है उसकी मुखालफत हो रही है। खासतौर से उत्तरी राज्यों के किसान इसके खिलाफ हैं?
मेरा मानना है कि समिति की जिन सिफारिशों पर विवाद नहीं है और उन पर किसान संगठन व उद्योग सहमत हैं, उनको लागू कर देना चाहिए। उत्तरी राज्यों में गन्ना मूल्य की एसएपी व्यवस्था और गन्ना आरक्षण क्षेत्र व्यवस्था समाप्त करने पर विवाद है। इन मुद्दों पर अभी और चर्चा की जरूरत है। इसलिए, अगर इन पर सरकार अभी फैसला नहीं लेती है तो उससे कोई बड़ी समस्या पैदा नहीं होगी। ऐसे में कुछ नहीं करने से कुुछ मुद्दों पर फैसला ले लेना चाहिए।
समिति ने जूट पैकेजिंग आर्डर से भी उद्योग को छूट देने की बात कही है। शायद सरकार इस दिशा में बढ़ भी रही है?
यह बहुत जरूरी है क्योंकि सीमेंट उद्योग को इस आर्डर से काफी पहले छूट मिल गई थी। साथ ही जूट पैकेजिंग से चीनी की गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ता है। खाद्यान्नों की बढ़ती सरकारी खरीद से इनकी उपलब्धता में भी दिक्कत आती है। जहां तक जूट पैकेजिंग के लिए मांग की बात है तो वह तो लगातार बढ़ रही है क्योंकि सरकार द्वारा प्लास्टिक पर प्रतिबंध के चलते जूट पैकेजिंग की मांग का दायरा काफी बढ़ा है। उम्मीद है कि सरकार जल्दी ही इस बारे में फैसला लेगी।