{"_id":"2b6b18d6e2fcf118c08043c796413a3d","slug":"immediately-arouse-confidence-in-indian-economy","type":"story","status":"publish","title_hn":"अर्थव्यवस्था में तुरंत जगाना होगा भरोसा","category":{"title":"Business archives","title_hn":"बिज़नेस आर्काइव","slug":"business-archives"}}
अर्थव्यवस्था में तुरंत जगाना होगा भरोसा
डीके जोशी (मुख्य अर्थशास्त्री, क्रिसिल)
Updated Thu, 29 Aug 2013 01:39 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जीडीपी और रुपए में भारी गिरावट ने सभी के लिए चिंता की स्थिति पैदा कर दी है। ऐसे में अब सरकार के तरफ से सबसे अहम कदम यह होना चाहिए कि वह माहौल में सुधार करे। सरकार के पास सुधार के स्तर पर तुरंत संदेश देने का केवल यही विकल्प है।
विज्ञापन
मेरा मानना है कि सरकार को विदेशी निवेशकों के साथ-साथ उद्योग जगत के अंदर भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति फिर से भरोसा जगाना होगा। एक बार यह भरोसा वापस लौटता है तो बहुत कुछ पटरी पर आ जाएगा।
विज्ञापन
पढ़ें, घाटा पाटने को 500 टन सोना गिरवी रखेगी सरकार!
विज्ञापन
इस समय घरेलू स्तर के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां रुपए और अर्थव्यवस्था को कमजोर कर रही हैं। एक तो सरकार का चालू खाता घाटा बहुत बढ़ गया है। यानी देश में आयात ज्यादा हो रहा है और निर्यात बहुत कम हो रहा है।
इसके अलावा देश में परियोजनाओं को मंजूरी मिलने में काफी अड़चनें आ रही हैं। भूमि अधिग्रहण के संबंध में भी असमंजस है। कई खनन परियोजनाओं पर रोक लगी हुई है। ऐसे में सभी विकासपरक गतिविधियां ठप सी हो गई हैं।
पढ़ें, क्यों हो रही है रुपए की जबर्दस्त पिटाई
घरेलू वजहों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भी रुपए और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रही हैं। अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से राहत पैकेज में कटौती का अंदेशा हैं। साथ ही सीरिया पर हमले की आशंका ने कच्चे तेल की कीमतों को भी बढ़ा दिया है, जिससे स्थिति और खराब हो गई है।
देश में इस समय विदेशी संस्थागत निवेशकों का निवेश नकारात्मक स्तर पर पहुंच गया है। इसे देखते हुए मेरा मानना है कि सरकार को जमीनी स्तर पर तुरंत सुधार के कदम उठाने होंगे।
खनन क्षेत्र में लगी रोक को हटाना बहुत जरूरी है, जिससे कि निर्यात में बढ़ोतरी की जा सके। अटके प्रोजेक्ट्स को फिर से शुरू करना और भूमि अधिग्रहण संबंधी मुद्दों को तुरंत हल करना भी बेहद अहम है।
इसके अलावा दीर्घकालीन नीति के तहत कोयले के आयात पर निर्भरता कम करना बहुत जरूरी है। इन कदमों के जरिये निवेश के माहौल में फिर से तेजी लाई जा सकती है।
इस बात की भी चर्चा है कि हम साल 1991 वाली स्थिति में पहुंच गए हैं। पर मुझे ऐसा नहीं लगता है।
पढ़ें, ‘हालात नहीं सुधरे तो आ सकती है आर्थिक सुनामी’
अभी हमारे पास विदेशी मुद्रा का पर्याप्त रिजर्व है, जो कि अपने टिकाऊ स्तर यानी आयात के लिए सात-आठ महीने के रिजर्व पर है। ऐसे में फिलहाल सोने को गिरवी रखने या आईएमएफ से कर्ज लेने की मजबूरी हम पर नहीं है।
अगर सरकार माहौल में सुधार करती है तो रुपए की कमजोरी को देखते हुए यहां डॉलर में काफी निवेश होगा। इसका भी हमें फायदा मिलेगा। कुल मिलाकर मेरा मानना है कि भरोसा बढ़ाने की जरूरत है ताकि चीजें पटरी पर आ जाएं।