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गारमेंट एक्सपोर्ट में जगी सुधार की उम्मीद

Thu, 11 Apr 2013 09:35 PM IST
नई दिल्ली/अजीत सिंह
नई दिल्ली/अजीत सिंह Updated Thu, 11 Apr 2013 09:35 PM IST
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hopes of improving in garment exports

बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देश से मात खा रहे देश के रेडीमेड गारमेंट एक्सपोर्ट में सुधार की उम्मीद जगी है। जनवरी के बाद अमेरिका और नए बाजारों से आई मांग ने गारमेंट इंडस्ट्री में हलचल बढ़ा दी है।

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वित्त वर्ष 2012-13 के दौरान गारमेंट निर्यात में 10 फीसदी तक की गिरावट की आशंका थी, लेकिन हाल के महीनों में आए नए ऑर्डर निर्यात इस गिरावट पर अंकुश लगा सकते हैं।
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अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (एईपीसी) के अध्यक्ष डॉ. ए. शक्तिवेल का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में अमेरिका के अलावा ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका, जापान और दक्षिणी अमेरिका जैसे उभरते बाजार से अच्छी मांग आई है।
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निर्यातक अब उभरते बाजारों पर फोकस कर रहे हैं। कनाडा और जापान को गारमेंट एक्सपोर्ट बढ़ाने की कोशिशें चल रही हैं। गौरतलब है कि अप्रैल 2012 से फरवरी 2013 के दौरान रेडीमेड गारमेंट एक्सपोर्ट में 7.6 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी।

क्लोदिंग मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीएमएआई) के अध्यक्ष राहुल मेहता का कहना है कि गैर-परंपरागत बाजारों को एक्सपोर्ट बढ़ाने की कोशिशें रंग ला रही हैं। लेकिन इंडस्ट्री के मार्जिन अभी भी बहुत कम हैं, जबकि इनपुट लागत बढ़ती जा रही है। नई विदेश व्यापार नीति और यूरोप के साथ होने वाले मुक्त व्यापार समझौते से टेक्सटाइल इंडस्ट्री को काफी उम्मीदें हैं।

उभरते बाजारों पर टिकीं उम्मीदें
पिछले तीन सालों में यूरोप और अमेरिका जैसे परंपरागत बाजारों के अलावा अन्य देशों को रेडीमेड गारमेंट का निर्यात लगातार बढ़ा है। वर्ष 2010 में गैर-परंपरागत बाजारों को 2.9 अरब डॉलर का गारमेंट एक्सपोर्ट हुआ, जो 2012 में बढ़कर 4.4 अरब डॉलर तक पहुंच गया। नए बाजारों को खोजने और वहां निर्यात को बढ़ावा देने की रणनीति कामयाब रही है।


गारमेंट पर महंगे यार्न की मार
पिछले एक महीने में बढ़ी कॉटन यार्न की कीमतों ने अपैरल इंडस्ट्री की परेशानी बढ़ा दी है। एईपीसी के अध्यक्ष डॉ. ए. शक्तिवेल का कहना है कि यार्न उत्पादकों ने एक मार्च से एक अप्रैल, 2013 के बीच कॉटन यार्न के दाम 211 रुपये प्रति किग्रा से 248 रुपये प्रति किग्रा तक बढ़ा दिए हैं। यार्न उत्पादक आपूर्ति बंद कर बनावटी मांग पैदा कर रहे हैं। जिसकी मार गारमेंट के अलावा हैंडलूम सेक्टर पर भी पड़ रही है। यार्न की कीमतें कम किए बगैर चीन और वियतनाम जैसे देशों का मुकाबला करना मुश्किल है।

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