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इंटर-रीजनल ग्रिड को मजबूत बनाए सरकार

Mon, 29 Sep 2014 09:00 AM IST
सुजय मेहदूदिया/नई दिल्ली
सुजय मेहदूदिया/नई दिल्ली Updated Mon, 29 Sep 2014 09:00 AM IST
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Government to strengthen inter-regional grid

ऊर्जा मंत्रालय द्वारा नियुक्त किए गए एक सलाहकार ने देश में बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच अंतर को खत्म करने के लिए इंटर-रीजनल ग्रिड को मजबूत करने का आह्वान किया है। सलाहकार ने कहा है कि भविष्य में प्रमुख तौर पर बिजली की मांग देश के उत्तरी, दक्षिणी और पश्चिमी क्षेत्र से पैदा होगी। ऊर्जा मंत्रालय ने सलाहकार की नियुक्ति देश के ट्रांसमिशन एंड वितरण (टीएंडडी) सिस्टम के लचर प्रदर्शन का समाधान ढूंढ़ने के लिए की थी।

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ऊर्जा मंत्रालय को सौंपी अपनी रिपोर्ट में सलाहकार ने कहा है कि देश में ऊर्जा की प्रमुख तौर पर मांग उत्तरी, दक्षिणी और पश्चिमी क्षेत्र से पैदा होने की उम्मीद है जबकि ऊर्जा की आपूर्ति देश के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में ही केंद्रित रहने की उम्मीद की जा रही है। इसके परिणामस्वरूप देश में बड़े पैमाने पर मांग और आपूर्ति के बीच असंतुलन पैदा होगा। इस असंतुलन को इंटर रीजनल ट्रांसफर से खत्म किया जा सकता है।
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रिपोर्ट में ग्रिड की क्षमता का आकलन करते हुए सलाहकार ने कहा है कि इंटर-रीजनल क्षमता मौजूदा 21 गीगावाट से बढ़कर 2017 तक 78.5 गीगावाट तक पहुंचने की उम्मीद है। ऐसे में यह अहम है कि नई सरकार इंटर-रीजनल ग्रिड की मजबूती के लिए काम करे।
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ऊर्जा मंत्रालय के रिस्ट्रक्चर्ड एक्सीलरेटेड पावर डेवलपमेंट एंड रिफॉर्म्स प्रोग्राम (आर-एपीडीआरपी) का अहम मकसद टीएंडडी नुकसान को कम करना और इसको 2016 तक राष्ट्रीय औसत 15 फीसदी के स्तर पर लाना था। रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा स्थिति को देखते हुए टीएंडडी नुकसान 2020 तक भी लक्ष्य के अनुरूप 15 फीसदी तक आना मुश्किल है। आर-एपीडीआरपी के तहत टीएंडडी नुकसान 2011 तक कम करके 30 फीसदी और 2014 तक 21 फीसदी के स्तर पर लाना था। सलाहकार का आकलन है कि यह लक्ष्य पूरा नहीं होगा और 2014 में टीएंडडी नुकसान 24 फीसदी होगा और आने वाले वर्षों में यह स्तर बना रहेगा।


देश के टीएंडडी सेक्टर के मौजूदा स्ट्रक्चर में समस्याओं का उल्लेख करते हुए सलाहकार ने कहा है कि निजी क्षेत्र विभिन्न चुनौतियों और सरकार के समर्थन के अभाव में इस क्षेत्र में भागीदारी और निवेश को लेकर चिंतित है। पिछले वर्षों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। इसकी वजह से दूसरी कंपनियां इस तरह का कदम उठाने के प्रति संदेह का भाव रखती हैं।

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