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घाटा पाटने को 500 टन सोना गिरवी रखेगी सरकार!
नई दिल्ली/ब्यूरो
Updated Thu, 29 Aug 2013 01:31 AM IST
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न तो दावों की बौछार का असर पड़ा और न ही ढेरों आश्वासन ही काम आए। वोट के लिए सजाई गई खाद्य सुरक्षा की थाली से अर्थव्यवस्था में मचा बवंडर और तेज हो गया।
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चौतरफा हाहाकार के बीच बुधवार को डॉलर के मुकाबले रुपया अपने नए न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया, तो सोना ने भी अपनी चमक का नया कीर्तिमान बना लिया। सरकार खुल कर तो नहीं इशारों-इशारों में हालात बेकाबू होने की बात स्वीकार कर रही है।
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सरकार के वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा का चालू खाता के घाटे को पाटने के लिए 500 टन सोना गिरवी रखने की सलाह अर्थव्यवस्था की आपात स्थिति को साफ जाहिर कर रहा है।
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अंतरराष्ट्रीय रेटिंग संस्था स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने भी भविष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत और पतली होने का अनुमान जता कर सरकार के माथे पर बल डाल दिया है। देशी विदेशी निवेशकों का भरोसा ऐसा टूटा है कि अर्थव्यवस्था अंधेरे कुएं में फंसती दिख रही है।
रुपए की पिटाई और बेकाबू होते सकल घाटे में महंगाई के और उफान पर पहुंचने की आशंका ने बाजार ही नहीं यूपीए सरकार और कांग्रेस के भीतर भी सियासी खलबली मचा दी है।
इस बिगड़ते हालात में सरकार के हाथ पांव फूल गए हैं, तो विपक्ष का सियासी हमला और तेज हो गया है। भाजपा ने रसातल की ओर जा रही अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए चुनाव को ही एक मात्र विकल्प बताया है। तो सरकार में चुनाव से ठीक पहले आए इस बड़े संकट को टालने के लिए शीर्ष स्तर पर मंथन का दौर जारी है।
अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए अब तक के सारे प्रयास ध्वस्त हो जाने के बाद सरकार आर्थिक सुधारों की गाड़ी को पूरी रफ्तार देने की कोशिश में है।
इस क्रम में संसद के मानसून सत्र में सरकार किसी भी कीमत पर पेंशन और बीमा विधेयक को पारित कराने की रणनीति बना रही है।
उधर, तमाम दावों और प्रयासों के बावजूद लगातार बदहाली की ओर बढ़ती जा रही अर्थव्यवस्था से सरकार और कांग्रेस के भीतर गहरी बेचैनी और चिंता का माहौल है।
खाद्य सुरक्षा बिल के पास होने से बाजार में मचे बवंडर और रुपए के बुधवार को लगभग 69 के करीब पहुंचने के बाद सरकार लगभग बेचारगी की हालात में दिखाई दे रही है।
क्योंकि उसका कोई भी कदम और आश्वासन बाजार में भरोसा पैदा करने में नाकाम रहा है। शायद यही वजह है कि खाद्य सुरक्षा की थाली सजाने के बावजूद चुनाव के पहले सरकार और कांग्रेस के रणनीतिकारों को बाजार को सियासी खेल खराब होने का डर गहराने लगा है।
सूत्रों के मुताबिक यही कारण है कि हालात पर चर्चा के लिए जहां बीते एक सप्ताह में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और वित्त मंत्री पी चिदंबरम के बीच दो बार मुलाकात हुई है। वहीं अब पूरी पार्टी प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री पर हालात को संभालने के लिए लगातार दबाव बढ़ा रही है।
बेकाबू होते जा रहे हालात को संभालने के लिए सरकार अगले कुछ दिनों में कुछ और उपायों की घोषणा करेगी। खासतौर से आर्थिक सुधारों को गति देने का संकेत देने के लिए सरकार इसी सत्र में पेंशन और बीमा से संबंधित विधेयक को हर हाल में पारित कराने की तैयारियों में जुटी है।
भाजपा ने हालांकि पेंशन विधेयक को पारित कराने में सहयोग देने की बात कही है, मगर बीमा क्षेत्र में सरकार पार्टी से अब तक आश्वासन नहीं ले पाई है। हालांकि भाजपा को मनाने के लिए पर्दे के पीछे से लगातार कोशिशें हो रही हैं।
प्रमुख वजह है वोट की राजनीति
दरअसल यूपीए सरकार की दूसरी पारी में सामाजिक क्षेत्र मसलन मनरेगा, शिक्षा का अधिकार, मध्यान भोजन जैसे कई योजनाओं पर खर्च किए गए लगभग छह लाख करोड़ रुपए से बाजार में गलत संदेश गया।
इसी बीच जब बीते सोमवार को सरकार ने खाद्य सुरक्षा की चुनावी थाली सजाई तब बाजार का धैर्य जवाब दे गया। इस योजना पर भी लगभग 1.22 लाख करोड़ से 2.41 लाख करोड़ खर्च होने का अनुमान है।
हालांकि सरकार ने स्थिति को भांपते हुए बीते महीने बुनियादी ढांचागत क्षेत्र में 1.93 लाख करोड़ रुपए तो बीते सोमवार को इसी क्षेत्र में 1.83 लाख करोड़ रुपए की योजनाओं को हरी झंडी दी।
इस बीच आरबीआई ने भी सरकार के निर्देशों के अनुरूप कदम उठाए। मगर इससे पहले ही बाजार में नकारात्मक संकेत जा चुका था।
संभाले नहीं संभाल रही अर्थव्यवस्था ने चुनाव की तैयारियों में जुटी कांग्रेस और सरकार के रणनीतिकारों की परेशानी बढ़ा दी है।
पार्टी पहले से भी चुनाव में सीटें घटना तय मान कर चल रही थी। सीटें ज्यादा कम न हों, इसके लिए ही आनन फानन खाद्य सुरक्षा का दांव खेला गया। मगर इस चुनावी दांव से उपजे भीषण आर्थिक संकट ने सरकार के सामने नया संकट खड़ा कर दिया।
अब नई परिस्थितियों में उसे इस बात का भय है कि कहीं सीटों की संख्या इतनी ज्यादा न घट जाए कि सरकार में बने रहने का सपना पूरा न होने पाए।
वैसे भी डीएमके और तृणमूल कांग्रेस का यूपीए से किनारा करने के बाद कांग्रेस के पास राकांपा को छोड़ कर कोई बड़ा दल नहीं है। यही कारण है कि अब पूरी पार्टी प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री पर किसी भी तरह से हालात संभालने का दबाव डाल रही है।
किसने क्या कहा
हमारे पास 31 हजार टन सोना है। अगर हम 500 टन सोने को गिरवी रख कर नकदी उगाहेंगे, तो चालू खाता के घाटे का निपटारा हो सकता है। साल 1991 और 2009 में ऐसा किया गया था। हालांकि यह मेरा सुझाव है, क्योंकि इस बारे में वित्त मंत्रालय और आरबीआई ही फैसला कर सकता है।--आनंद शर्मा, वाणिज्य मंत्री
साफ है कि सरकार के हाथ से सबकुछ निकल गया है। अर्थव्यवस्था सुधारना सरकार की वश की बात नहीं रह गई है। इसका एक ही विकल्प है कि समय रहते आम चुनाव करा लिया जाए।--यशवंत सिन्हा, भाजपा नेता और पूर्व वित्त मंत्री
अर्थव्यवस्था में सुधार के दावे के नाम पर वित्त मंत्री बकवास कर रहे हैं। रुपया अभी और कमजोर होगा, क्योंकि सरकार ने स्थिति से निपटने की न तो तैयारी की और न ही कोई नीति ही बनाई।--गुरुदास दासगुप्ता, भाकपा नेता
राजकोषीय घाटा, चालू खाता घाटा बढ़ने और रुपए की कीमत में रिकॉर्ड गिरावट के कारण भारत की अर्थव्यवस्था भविष्य में और खराब होगी। फिलहाल स्थिति संभलने के आसार दूर-दूर तक नहीं हैं।--स्टैंडर्ड एंड पुअर्स
डॉलर की डोली पर रुपए की रुखसती हो रही है और कांग्रेस जश्न मना रही है। दरअसल अब बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा है डॉलर, यही है कांग्रेस का भारत निर्माण।--मुख्तार अब्बास नकवी, भाजपा नेता