फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Business archives ›   gold craze is double in india NSSO reprots

सोने के दीवाने हुए ग्रामीण, छोड़ा शहरियों को पीछे

Sat, 22 Nov 2014 12:44 PM IST
Updated Sat, 22 Nov 2014 12:44 PM IST
विज्ञापन
gold craze is double in india NSSO reprots
सोना सदा के लिए है। सोने के प्रति दीवानगी का ही असर है कि शादी ब्याह हो या निवेश, भारतीय जनता सोने को ज्यादा तवज्जो देती रही है। लेकिन पिछले एक दशक के आंकड़ों पर गौर करें तो कुछ चौंकाने वाली बातें सामने आई है। आइए जानते हैं निवेश को लेकर भारतीय जनता की नजर किस चीज पर ज्यादा टिकती है।
विज्ञापन


लगातार बढ़ती कीमतों के बावजूद ग्रामीण उपभोक्ता की दीवानगी सोने को लेकर बढ़ी है। ग्रामीण अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा सोना खरीदने में खर्च कर रहा है। जबकि शहरी वर्ग कार जैसी मदों पर खर्च कर रहा है। घर जायदाद पर खर्च करने का प्रतिशत एकाएक घटा है। एनएसएसओ (NSSO) की रिपोर्ट से पता चलता है कि भारतीय उपभोक्ता के किस वर्ग ने पिछले एक दशक में किस मद पर ज्यादा खर्च किया।
विज्ञापन

शेयर या फंड नहीं, केवल सोना

gold craze is double in india NSSO reprots
रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण क्षेत्र के लोगों ने 2004-05 में अपनी आय का 13.8 फीसदी धन सोने की खरीद में खर्च किया। 2011-12 ग्रामीण जनता अपनी आय का 23.6 फीसदी हिस्सा सोने की खरीद पर लगा रही है।

दूसरी तरफ शहरी जनता 2004-05 में अपनी आय का 11.5 फीसदी हिस्सा सोने की खरीद पर खर्च करती थी और 2011-12 में यह फीसदी 19.9 तक बढा। कुल मिलाकर पिछले एक दशक में ग्रामीण जनता ने सोने खरीदने के मामले में शहरियों को पीछे छोड़ दिया।

इसका कारण माना जा रहा है कि एक तरफ जहां शहरी सोने के अलावा ट्रेंडी ज्वैलरी अपना रहे हैं, ग्रामीण जनता अभी भी सोने के गहनों पर विश्वास करती है। दूसरी और खास बात है कि जहां शहरी तबके ने शेयर, बॉन्ड, फंड जैसे निवेश माध्यमों को अपनाया है, ग्रामीण जनता की नजर में अब भी सोना निवेश का सबसे बेहतर जरिया है।

घर खरीदने पर कौन करता है ज्यादा खर्च

gold craze is double in india NSSO reprots
2004-05 के आंकड़े देखें जाएं तो ग्रामीण जनता ने अपनी आय का 33.4 फीसदी हिस्सा खर्च किया और 2011-12 तक आते आते ये प्रतिशत 18.1 फीसदी पर सिमट गया।

कुछ यही हाल शहरी जनता का रहा। शहरी जनता ने 2004-05 में 20.9 ‌हिस्सा ‌खर्च किया और 2011-12 तक आते आते ये महज 11.4 रह गया।

विशेषज्ञ इसका एक कारण ये बता रहे हैं कि रियल एस्टेट में लगातार आए उतार चढ़ाव के चलते उपभोक्ता का ध्यान यहां से भटका है। 2008 में आई वैश्विक आर्थिक मंदी को भी इस गिर रहे आंकड़े के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है।
विज्ञापन

किसको लगा लग्जरी गाड़ियों का शौक?

gold craze is double in india NSSO reprots
अब बात करते हैं वाहन पर होने वाले खर्च की। यहां चौंकाने वाले आंकड़े शहरी जनता की तरफ से ही मिले हैं। शहरी जनता पर एक दशक पहले भी कारों का जुनून था और अब भी है। शहरी जनता अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा कार व अन्य वाहन खरीदने में लगा रही है। 2004-05 में जहां शहरी जनता अपनी आय का 67.6 फीसदी हिस्सा कार खरीदने में लगा रही थी, 2011-12 में ये बढ़कर 68.07 हो गया।

दूसरी तरफ ग्रामीण जनता की दिलचस्पी भी वाहनों के प्रति बढ़ी है। 2004-05 में ग्रामीण तबका अपनी आय का 52.8 फीसदी हिस्सा गाड़ी खरीदने पर लगाता था और 2011-12 में ये प्रतिशत बढ़कर 58.3 हो गया।

जानकार कहते हैं कि मेट्रो सिटी के विस्तार के कारण जब किसानों को मुआवजा मिला तो उन्होंने लक्जरी गाड़ियां खरीदी और लाइफ स्टाइल को अपडेट किया। ठीक उसी तरह से मार्डन लाइफस्टाइल के चलते शहरी तबका गाड़ी पर ज्यादा खर्च करता आ रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed