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बीमार इकाई बनने से बचने के लिए ले बैंकों की मदद

Fri, 10 May 2013 11:04 PM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
नई दिल्ली/ब्यूरो Updated Fri, 10 May 2013 11:04 PM IST
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get help from banks to avoid becoming sick

रिजर्व बैंक ने बीमार इकाई घोषित होने के लिए न केवल नए मानक बनाए हैं, बल्कि बंद होते उपक्रमों के रिवाइवल के भी दिशा निर्देश बैंकों को दिए हैं। जिसे देखते हुए छोटे कारोबारियों (माइक्रो) को जागरूक बनकर बैंकों से मदद लेनी चाहिए। जिससे कि उनकी इकाइयां बीमार न घोषित हो।

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क्या हैं नए नियम
भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों के मुताबिक माइक्रो सेक्टर के तहत आने वाले कारोबारी ने यदि उपक्रम के लिए कर्ज लिया है और जिसका कर्ज बैंक के लिए एनपीए घोषित हो चुका है। साथ ही यह तीन महीने तक लगातार एनपीए है, तो वह बीमार इकाई में घोषित होगा। इसके लिए यदि कंपनी की नेटवर्थ गिरकर 50 फीसदी रह गई है, या दो साल से उपक्रम से कोई उत्पादन नहीं हो रहा है, तो कंपनी बीमार घोषित हो जाएगी।
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बैंक तीन महीने के अंदर देंगे रिपोर्ट
नए नियम के तहत यदि कोई उपक्रम बीमार इकाई के रूप में पात्र हो जाता है, तो बैंक को उसकी प्रासंगिकता पर रिपोर्ट अब तीन महीने के अंदर देनी होगी, पहले इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं थी।
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हैंडहोल्डिंग चरण में ही बैंक उठाएंगे कदम
आरबीआई ने बैंकों को कहा है कि जैसे ही उन्हें इस उपक्रम के खराब वित्तीय स्थिति का आभास हो, जैसे कि कंपनी बीमार होने की स्थिति में पहुंच रही है, तो वह उसी समय कंपनी के रिवाइवल के लिए कदम उठाएं। उसके तहत कारोबारी बैंक के साथ काउंसिलिंग कर सकते हैं। साथ ही कर्ज चुकाने के विकल्पों पर बात कर सकते हैं। यहीं नहीं, कारोबारी बैंक अधिकारियों के सामने अपनी इकाई के लिए रिवाइवल की योजना भी पेश कर सकते हैं। साथ ही कारोबारियों के पास बैंक के साथ वन टाइम सेटलमेंट का भी विकल्प होता है।

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