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भारतीय क्लस्टरों की बढ़ी विदेश में पूछ-परख

Wed, 12 Sep 2012 12:51 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क Updated Wed, 12 Sep 2012 12:51 PM IST
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foreign smes are taking interest in clusters of India
लघु व मझोले औद्योगिक क्लस्टरों की भारत में सफलता की कहानी अफ्रीका, पश्चिम एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में नई मोड़ ले रही है। इस क्षेत्र के लोग क्लस्टर पद्घति सीखने में काफी रुचि दिखा रहे हैं। इससे यहां छोटे व्यवसायों और सलाहकारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। ये देश प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करने और लागत में कमी लाने के लिए भारतीय एसएमई द्वारा अपनाई गई पद्घति का अनुकरण करना चाहते हैं।
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हाल ही में दक्षिण अफ्रीका, केन्या, तंजानिया, सूडान, कांगो, श्रीलंका और अफगानिस्तान से आए छोटे उद्यमों के कार्यकारियों की बैठक चंडीगढ़ में हुई। इसमें वे अपने भारतीय समकक्षों से मिलकर यह जानने का प्रयास किया कि भारतीय एसएमई अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता को कैसे बढ़ा रहे हैं।
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क्लस्टर कई कंपनियों का समूह होता है जो अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए आपस में मिलजुलकर काम करते हैं। ये कंपनियां कचरा कम करने और उत्पादन क्षमता व गुणवत्ता बढ़ाने के लिए साथ मिलकर नये-नये तरीके ईजाद करती हैं, ताकि समग्र प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाई जा सके। इसके लिए बेहतर उत्पादन तरीके, ग्राहकों की शिकायत घटाने और संसाधनों का बेहतर उपयोग जैसी बातों पर विशेष ध्यान दिये जाते हैं। क्लस्टरों में जगह, श्रमशक्ति, सामग्री, उपकरण, ऊर्जा और कर्मचारियों को सशक्त बनाने पर जोर दिया जाता है।
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क्लस्टरों के बारे में पूछताछ सीआईआई अवंता एसएमई प्रतिस्पर्धात्मकता केंद्र के माध्यम से की जा रही है। यह केंद्र लघु व मझोले उद्योगों में प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने के लिए विभिन्न क्लस्टर विकास कार्यक्रम चला रहे हैं। इस केंद्र के प्रमुख हरिंदरजीत सिंह ने बताया कि उत्पादकता बढ़ाने का प्रमुख औजार है लागत में कमी करना।

उन्होंने बताया कि हम विभिन्न विनिर्माण संगठनों को मिलाकर एक कस्टमाइज्ड मॉडल विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं। इससे ऊर्जा और मानव संसाधन के लिए बेहतर प्रबंधन होगा। उन्होंने कहा कि इसके तहत क्लस्टर इकाइयों में संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएंगे ताकि विचारों का आदान-प्रदान बेहतर हो सके।

सिंह ने कहा कि क्लस्टर प्रणाली से हीरो साइकिल काफी लाभान्वित हुई है। उन्होंने बताया कि दो क्लस्टरों में परामर्श कार्यक्रम पूरा करने के बाद सीआईआई-अवंता केंद्र अब तीसरे क्लस्टर में ऐसे ही कार्यक्रम चलाने में लगे हुए थे। यह केंद्र इंडोनेशिया के इस्पात विनिर्माण इकाइयों में ऊर्जा दक्षता बढ़ाने के लिए पहले ही काम कर चुका है।

सिंह ने बताया कि भारत में क्लस्टर प्रणाली की सफलता को देखते हुए कई देशों ने इसे अपनाया है। विदेशों में छोटे व मझोले उद्यमी भारतीय क्लस्टर प्रणाली के बारे में अधिक से अधिक जानना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि इंडोनेशिया में हम पहले से ही कार्यक्रम चला रहे हैं। साथ ही, अफ्रीका, दुबई और मालदीव में इसी प्रकार के कार्यक्रम चलाने की बात चल रही है।

हाल ही में दिल्ली स्थित मलावी उच्चायोग के अधिकारियों ने पंजाब का दौरा कर लुधियाना और जालंधर के क्लस्टरों के बारे में जानकारी हासिल की। अब वे अपने देश के लोगों को भारतीय प्रशिक्षकों से प्रशिक्षण दिलवाना चाहते हैं। वे विशेष रूप से प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के गुर सिखाने के लिए भारतीय प्रशिक्षकों से बातचीत कर रहे हैं।


वाहनों के कलपुर्जे बनाने वाली प्रमुख कंपनी बॉश इंडिया ऑटोमोटिव कम्पोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (एक्मा), संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन  (यूनिडो) और सीआईआई-अवंता केंद्र की सहायता से 60 से अधिक आपूर्तिकर्ताओं को प्रशिक्षित कर चुकी है।
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