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खाद्य मंत्रालय, योजना आयोग के बीच फंसी भंडार योजना
नई दिल्ली/अजीत सिंह
Updated Fri, 02 Nov 2012 08:08 PM IST
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देश में खाद्यान्न भंडारण की समस्या से निपटने के लिए 20 लाख मीट्रिक टन क्षमता के महाभंडार (साइलोस) बनाने की योजना खाद्य मंत्रालय और योजना आयोग के बीच फंसी है। पिछले दो साल चली रही तैयारियों के बावजूद अभी महाभंडार बनाने का काम आगे नहीं बढ़ पाया है। जबकि सबके लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भंडारण क्षमता को बढ़ाना बेहद जरूरी है।
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खाद्य मंत्रालय के उच्च अधिकारियों का कहना है कि साइलोस निर्माण के लिए 10 राज्यों में 44 स्थान चिन्हित किए जा चुके हैं, लेकिन अभी तक इनके निर्माण के लिए टेंडर जारी नहीं हो पाए हैं। इन स्थानों पर पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत 25 और 50 हजार मीट्रिक टन क्षमता के महाभंडार बनाने हैं, जिसके लिए फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) को नोडल एजेंसी बनाया गया है।
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एफसीआई इसके लिए बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, यूपी, पश्चिम बंगाल, असम, केरल और गुजरात में जगह का चुनाव कर चुका है। इन तमाम तैयारियों के बावजूद जमीन पर यह योजना आगे नहीं बढ़ पाई है।
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मंत्रालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि साइलोस निर्माण की योजना का प्रस्ताव योजना आयोग ने तैयार किया था। योजना आयोग ने प्राइवेट कंसल्टेंट मोट मैक्डोनल्ड से इस योजना की स्टडी भी करवाई थी। इस रिपोर्ट को आए एक साल बीतने के बाद भी साइलोस निर्माण का काम शुरू नहीं हुआ है। योजना आयोग साइलोस निर्माण की शर्तों को तय करने के लिए एक तकनीकी सलाहकार की नियुक्ति करना चाहता था। इसकी नियुक्ति में ही चार महीने से ज्यादा का समय बीत चुका है।
साइलोस के जरिये भंडारण क्षमता को बढ़ाना की कवायद फरवरी 2010 से चल रही है। इस साल फरवरी में अधिकार प्राप्त मंत्रियों के समूह (ईजीओएम) ने इसके प्रस्ताव को मंजूरी दी थी, लेकिन तब से अब तक यह योजना आगे नहीं बढ़ पाई है।
उत्तर प्रदेश में 50 हजार मीट्रिक टन क्षमता के महाभंडारों के लिए जौनपुर, कन्नौज, फैजाबाद, फतेहपुर, बस्ती और देवरिया को चुना गया है, जबकि हरियाणा में जींद, करनाल, रोहतक, सोनीपत और पलवल में ऐसे ही साइलोस बनने का प्रस्ताव है। मध्य प्रदेश और हरियाणा सरकार ने इस योजना के लिए जमीन देने में असमर्थता जताई है, जबकि बाकी राज्यों में जमीन को लेकर ज्यादा दिक्कत नहीं है।
योजना आयोग से मिली जानकारी के अनुसार सितंबर में प्रोजेक्ट कंसल्टेंट की नियुक्ति होनी थी, लेकिन कोई भी कंसल्टेंट मानकों पर खरा नहीं उतर पाया, जिसकी वजह से नियुक्ति में देरी हुई। इस योजना पर काम तेज करने के लिए खाद्य सचिव की अध्यक्षता में एक अंतर मंत्रालय समूह बनाया गया है।