फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Business archives ›   five Unusual Economic Indicators

लड़कियों की स्कर्ट और मर्दों के अंडरवियर बताते हैं किसके पास कितना पैसा

Sun, 13 Sep 2015 08:57 AM IST
Updated Sun, 13 Sep 2015 08:57 AM IST
विज्ञापन
five Unusual Economic Indicators

आपने देश की आर्थिक स्थिति मापने के पैमाने जीडीपी के बारे में खूब सुना होगा, लेकिन किसी देश की आर्थिक स्थिति जानने के कुछ ऐसे भी पैमाने हैं जो आपको हैरान कर सकते हैं।

विज्ञापन


हेमलाइन इंडेक्स यानी स्कर्ट इंडेक्स... इसके तहत किसी भी देश की आर्थिक हालत जानने के लिए लड़कियों की स्कर्ट देखी जाती है। इस फॉर्मूले के अनुसार जिस देश में लड़कियों की स्कर्ट जितनी छोटी होती है, वहां की इकोनॉमी उतनी ही मजबूत होती है।
विज्ञापन


वहीं दूसरी ओर अगर लड़ियां लंबी स्कर्ट पहनती हैं तो माना जाता है कि उस देश के हालात आर्थिक रूप से अच्छे नहीं होते। हालांकि, वैश्विक स्तर पर अर्थशास्त्री इस फॉर्मूले को मानने से इनकार करते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


दरअसल, 1926 में अमेरिका के अर्थशास्त्री जॉर्ज टेलर इसी फॉर्मूले को मानते थे। वे लड़कियों की स्कर्ट देखकर ही इस बात का पता लगाते थे कि किस देश के पास कितना पैसा है।

यह फॉर्मूला कहता है कि गिरते बाजार के साथ-साथ लड़कियों का छोटी स्कर्ट पहनने का चलन भी कम हो जाता है। मंदी के समय में पाया गया कि लड़कियों ने छोटी स्कर्ट पहनना कम कर दिया। लड़कियां छोटी स्कर्ट इसलिए पहनती हैं, ताकि वे अपना स्टेटस दिखा सकें।

मर्दों का अंडरवियर

five Unusual Economic Indicators

जहां एक ओर महिलाओं के मामले में लिपस्टिक की अधिक खरीदारी देश की खराब आर्थिक हालत दिखाता है, वहीं दूसरी ओर मर्दों का कम अंडरवियर खरीदना उस देश की खराब आर्थिक हालत का सूचक माना जाता है।

इस फॉर्मूले के अनुसार मर्दों का ये मानना होता है कि वह अंडरवियर खरीदने की योजना को भविष्य के लिए टाल सकते हैं। वे मानते हैं कि जब पैसे अधिक होंगे तो अंडरवियर खरीद लिया जाएगा।

इस तरह से अगर कम अंडरवियर खरीदना किसी देश की खराब आर्थिक स्थिति, जबकि अधिक अंडरवियर खरीदना उस देश की मजबूत आर्थिक स्थिति को दर्शाता है।

2011 में द एसोसिएटेड प्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार मर्दों के अंडरवियर की सेल 7 प्रतिशत बढ़ी थी और उसी दौरान देश की आर्थिक स्थिति भी पहले की अपेक्षा मजबूत हुई थी।

लिपस्टिक से पता चलती है देश की आर्थिक स्थिति

five Unusual Economic Indicators

यूं तो किसी देश की आर्थिक हालत का पता लगाने के लिए वहां के लोगों का रहन-सहन, इंफ्रास्ट्रक्चर, ग्रोथ रेट और लोगों की कमाई देखी जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि लिपस्टिक भी किसी देश की आर्थिक हालात बयां करने का पैमाना हो सकती है।

लिपस्टिक इंडेक्स किसी देश की आर्थिक स्थिति बताता है। कई रिसर्च हुई हैं जिनसे यह बात सामने आई है कि अगर किसी देश की महिलाएं कपड़े खरीदने में अधिक खर्च करती हैं तो इसका मतलब है कि उस देश की आर्थिक हालत काफी अच्छी है।

वहीं दूसरी ओर, अगर किसी देश की महिलाएं लिपस्किट अधिक खरीदती हैं तो इससे पता चलता है कि उस देश की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। इसका मतलब मंदी के समय में महिलाएं लिपस्टिक अधिक खरीदती हैं।

1990 के दशक में एसटी लाउडर कंपनी के चेयरमैन लियोनार्ड लाउडर ने इस इंडेक्स की शुरुआत की थी। इसके लिए उन्होंने महिलाओं के व्यवहार का भी अध्ययन किया।

दरअसल, इस इंडेक्स के पीछे तर्क यह है कि मुश्किल हालात में महिलाएं अधिक आकर्षक दिखना चाहती हैं और इसके लिए वह लिपस्टिक खरीदने में काफी पैसा खर्च करती हैं।

लिपस्टिक के अलावा मुश्किल के समय में महिलाएं कपड़े, जूते और पर्स आदि खरीदने में कम पैसे खर्च करती हैं। ऐसे में मंदी में महिलाएं लिपस्टिक खरीदने पर अधिक खर्च करती हैं।

चेहरे की खुशी से पता चलते हैं देश के हालात

five Unusual Economic Indicators

यूं तो किसी देश की आर्थिक स्थिति का पता करने के लिए किसी देश की जीडीपी देखी जाती है, लेकिन ये फॉर्मूला हर देश पर सही नहीं बैठता है। यही कारण है कि कुछ देशों ने देश की आर्थिक स्थित या यूं कहें कि तरक्की को मापने का अलग ही तरीका इजात किया है।

भूटान ने 1971 में देश की आर्थिक स्थिति को मापने के लिए जीडीपी का पैमाने के तौर पर इस्तेमाल खारिज कर दिया। इसके बाद 1972 में भूटान के नरेश जिग्मे सुंग वांगचुक ने देश की तरक्की मापने के लिए ग्रॉस हैप्पीनेस इंडेक्स (सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता) का रास्ता अपनाया।

इसकी खोज भूटान स्टडीज सेंटर के मुखिया करमा उपा और कनाडियन डॉक्टर माइकल पेनॉक ने किया था। इसके तहत लोगों की खुशी देखकर पता किया जाता है कि देश की आर्थिक हालत कैसी है।

बर्गर से भी पता चलती है आर्थिक स्थिति

five Unusual Economic Indicators

इसकी खोज द इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने की थी। 1986 में द इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने दुनिया भर में अलग-अलग देशों के खर्च को मापने या फिर उनकी आर्थिक स्थिति को जानने के लिए बिग मैक सूचकांक तैयार किया।

इसके तहत दुनिया भर के विभिन्न देशों में मैकडोनल्ड के स्टोर्स में बेचे जाने वाले बिग मैक हैमबर्गर को आधार बनाया गया, जिसके अनुसार यह देखा जाने लगा कि कौन सा देश कितना खर्च करता है, जिससे उस देश की आर्थिक स्थिति का पता चलता है।

ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि आखिर हैमबर्गर ही क्यों। दरअसल अर्थशास्त्रियों का मानना था कि हैमबर्गर पूरी दुनिया में अधिकतर जगह उपलब्ध है, जिसके चलते इसे ही आधार बनाया गया।

उनका मानना था कि पूरी दुनिया में उपलब्ध होने की वजह से एक मानक कीमत तय की जा सकती है, जो उस देश की मुद्रा और डॉलर के विनिमय दर पर आधारित होगी।

बीते करीब 25 सालों में बिग मैक सूचकांक से मिले नतीजों को देखा जाए तो इसके अधिकतर परिणाम सही साबित हुए हैं, जिसने इस सूचकांक को और भी लोकप्रिय करने में मदद की।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed