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रक्षा क्षेत्र में एफडीआई से मिलेगी मदद
नई दिल्ली / डॉ विवेक लाल
Updated Mon, 14 Jul 2014 12:50 PM IST
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भारत की सीमाओं पर विकसित हो रहे भू राजनैतिक परिदृश्य और तेज आर्थिक विकास के परिणामस्वरूप आने वाले वर्षों में रक्षा क्षेत्र में खर्च बढ़ाना होगा। पुराने उपकरणो की जगह नए उपकरण लाने और सशस्त्र बलों को संघर्ष के लिए तैयार रखने के लिए नई खरीद की जरूरत होगी।
आंतरिक सुरक्षा की जरूरतें भी बढ़ रहीं हैं और इसके लिए आंतरिक सुरक्षा के लिए जरूरी उपकरणों की मांग बढ़ेगी। पारंपरिक रूप से भारत अंतर सरकारी खरीद के माध्यम से रक्षा क्षेत्र पर ज्यादा पैसा खर्च करता है। इससमें रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों (डीपीएसयू) की अहम भूमिका है। डीपीएसयू को करार के तहत उपकरणों का उत्पादन करने के लिए लाइसेंस मिला हुआ है।
भारत के रक्षा बाजार में डीपीएसयू का प्रभुत्व है, वहीं निजी क्षेत्र का मैन्यूफैक्चरिंग बेस टुकड़ो में बंटा हुआ है। मौजूदा क्षमता के लिहाज से देखें तो डिजाइन टू प्रोडक्शन क्षमताओं की काफी कमी है। हमारी घरेलू इंडस्ट्री जरूरी उपकरणों को विकसित करने और आपूर्ति करने की स्थिति में नहीं हैं।
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ऐसे में जब तक भारत सरकार देश में रक्षा मैन्यूफैक्चरिंग के लिए इकोसिस्टम विकसित करने के लिए कदम नहीं उठाती, आयात पर हमारी निर्भरता बढ़ना तय है। बेहतर मैन्यूफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, रिसर्च एंड डेवलपमेंट (आरएंडडी) क्षमता, प्रतिभा, और विशेषज्ञता के साथ उपयुक्त कर ढांचा इस इको सिस्टम के लिए आवश्यक अवयव है।
इसके साथ हमें ग्लोबल ओरिजनल इक्युपमेंट मैन्यूफैक्चरर्स (ओइएम) को अपनी तकनीकी विशेषज्ञता साझा करने के लिए प्रोत्साहन देना होगा, जिससे भारत को रक्षा उत्पादन में आत्म निर्भरता का सपना साकार करने में मदद मिलेगी। रक्षा उत्पादन में एफडीआई के लिए मौजूदा 26 फीसदी सीमा ग्लोबल ओइएम को बेहतर माहौल नहीं मुहैया कराती, जिससे वे हमारे साथ अपनी प्रौद्योगिकी साझा करे।
यह बात 13 वर्ष पहले खोले गए रक्षा क्षेत्र में लगभग न के बराबर एफडीआई की आवक से भी साबित होती है। जब हम आत्म निर्भरता की बात करते हैं, तो इसका मतलब एक ऐसे प्लेटफार्म से है, जिस पर हम अपनी रक्षा तैयारियों को विकसित कर सकें और उपकरणों के जरूरी कल पुर्जे तैयार कर सकें। पहले के समय में ऐसी घटनाएं हुई हैं, जब भारत को आपूर्ति में बाधा का सामना करना पड़ा है। इसके लिए या तो भूराजनैतिक कारण जिम्मेदार रहे या ओइएम ने किसी खास सिस्टम का उत्पादन करना बंद कर दिया।
अगर ग्लोबल ओइएम को देश में मैन्यूफैक्चरिंग फैसिलिटी स्थापित करने के लिए तैयार किया जा सके, तो यह हमारे हित में होगा। सुरक्षा के लिहाज से आयात के बजाए ग्लोबल ओइएम को भारत में सिस्टम का उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित करना बेहतर होगा। डिफेंस मैन्यूफैक्चरिंग इंडस्ट्री एक मल्टी टेक्नोलॉजी सेक्टर है। डिफेंस प्रोडक्ट जटिल सिस्टम हैं। इसे तैयार करने के लिए कई वैज्ञानिक विधाओं और तकनीकी क्षेत्र से ज्ञान की जरूरत होती है।
एफडीआई की सीमा बढ़ने से रक्षा क्षेत्र में अहम प्रौद्योगिकी आएगी। हमें अपनी इस सोच को बदलना होगा कि हम अहम प्रौद्योगिकी खुद विकसित कर सकते हैं और हमें मौजूदा डिफेंस इंडस्ट्रस्ट्रियल बेस को विकसित करने के लिए लिए कदम उठाना चाहिए। ऐसी चिंताए हैं कि एफडीआई की सीमा बढ़ने से घरेलू उद्योग की ग्रोथ बाधित होगी। हालांकि अगर घरेलू इंडस्ट्री की उपलब्धियों और क्षमताओं का आकलन करते हैं, तो अंतर साफ दिखाई देता है। घरेलू इंडस्ट्री असेंबली में विशेषज्ञता रखती है, लेकिन डेवलपमेंट में हम बहुत कमजोर हैं।
एफडीआई की सीमा बढ़ाए जाने से भारतीय इंडस्ट्री खास कर निजी क्षेत्र के बीच संयुक्त उपक्रम स्थापित होंगे। निजी क्षेत्र को रक्षा उत्पादन में बड़ी भूमिका निभानी चाहिए। ग्लोबल ओइएम और निजी क्षेत्र के बीच गठजोड़ को सक्रिय तौर पर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। भारत को ओइएम को प्रौद्योगिकी साझा करने के लिए प्रोत्साहित करने का रवैया अपनाना चाहिए। यह 15 वर्ष पहले तैयार किए गए इंडियन आर्म्ड फोर्सेज लांग टर्म इंटीग्रेटेड पर्सपेक्टिव प्लान में अंतर्निहित भारत के रक्षा उद्देश्य को समर्थन भी करता है।
इस बात का उल्लेख करना भी अहम होगा कि औद्योगिक नीति एवं संर्वधन विभाग ने औद्योगिक लाइसेंस की जरूरत वाले रक्षा उपकरणों की 26 वीं सूची तैयार की है। इस सूची के मुताबिक सिर्फ फुल वैपन सिस्टम, डिफेंस एयरक्राफ्ट, वारशिप आदि के लिए औद्योगिक लाइसेंस की जरूरत है।
यह माना जा रहा है कि केंद्र सरकार का इरादा इस सूची में कवर नहीं किए गए रक्षा उपरकणों के लिए ऑटोमैटिक रूट से 100 फीसदी एफडीआई की अनुमति देने का है। इस बारे में सरकार की ओर से स्पष्टीकरण आने से स्पष्टता आएगी और निवेशक आश्वस्त होंगे। हमें देश में डिफेंस मैन्यूफैक्चरिंग के लिए इकोसिस्टम विकसित करने के साथ सेक्टर को एफडीआई के लिए खोलने को लेकर निर्णायक कदम उठाने चाहिए। इससे देश में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी आएगी और भारत ग्लोबल ओइएम के आपूर्ति तंत्र का भाग बन सकेगा।
डॉ विवेक लाल, इंडो-अमेरिकन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स द्वारा शुरू किए गए इंडो-यूएस स्ट्रेटेजिक डायलाग के चेयरमैन और साइबर सिक्योरिटी,डिफेंस व एअरोस्पेस के जाने-माने एक्सपर्ट हैं।
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आंतरिक सुरक्षा की जरूरतें भी बढ़ रहीं हैं और इसके लिए आंतरिक सुरक्षा के लिए जरूरी उपकरणों की मांग बढ़ेगी। पारंपरिक रूप से भारत अंतर सरकारी खरीद के माध्यम से रक्षा क्षेत्र पर ज्यादा पैसा खर्च करता है। इससमें रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों (डीपीएसयू) की अहम भूमिका है। डीपीएसयू को करार के तहत उपकरणों का उत्पादन करने के लिए लाइसेंस मिला हुआ है।
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भारत के रक्षा बाजार में डीपीएसयू का प्रभुत्व है, वहीं निजी क्षेत्र का मैन्यूफैक्चरिंग बेस टुकड़ो में बंटा हुआ है। मौजूदा क्षमता के लिहाज से देखें तो डिजाइन टू प्रोडक्शन क्षमताओं की काफी कमी है। हमारी घरेलू इंडस्ट्री जरूरी उपकरणों को विकसित करने और आपूर्ति करने की स्थिति में नहीं हैं।
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ऐसे में जब तक भारत सरकार देश में रक्षा मैन्यूफैक्चरिंग के लिए इकोसिस्टम विकसित करने के लिए कदम नहीं उठाती, आयात पर हमारी निर्भरता बढ़ना तय है। बेहतर मैन्यूफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, रिसर्च एंड डेवलपमेंट (आरएंडडी) क्षमता, प्रतिभा, और विशेषज्ञता के साथ उपयुक्त कर ढांचा इस इको सिस्टम के लिए आवश्यक अवयव है।
इसके साथ हमें ग्लोबल ओरिजनल इक्युपमेंट मैन्यूफैक्चरर्स (ओइएम) को अपनी तकनीकी विशेषज्ञता साझा करने के लिए प्रोत्साहन देना होगा, जिससे भारत को रक्षा उत्पादन में आत्म निर्भरता का सपना साकार करने में मदद मिलेगी। रक्षा उत्पादन में एफडीआई के लिए मौजूदा 26 फीसदी सीमा ग्लोबल ओइएम को बेहतर माहौल नहीं मुहैया कराती, जिससे वे हमारे साथ अपनी प्रौद्योगिकी साझा करे।
यह बात 13 वर्ष पहले खोले गए रक्षा क्षेत्र में लगभग न के बराबर एफडीआई की आवक से भी साबित होती है। जब हम आत्म निर्भरता की बात करते हैं, तो इसका मतलब एक ऐसे प्लेटफार्म से है, जिस पर हम अपनी रक्षा तैयारियों को विकसित कर सकें और उपकरणों के जरूरी कल पुर्जे तैयार कर सकें। पहले के समय में ऐसी घटनाएं हुई हैं, जब भारत को आपूर्ति में बाधा का सामना करना पड़ा है। इसके लिए या तो भूराजनैतिक कारण जिम्मेदार रहे या ओइएम ने किसी खास सिस्टम का उत्पादन करना बंद कर दिया।
अगर ग्लोबल ओइएम को देश में मैन्यूफैक्चरिंग फैसिलिटी स्थापित करने के लिए तैयार किया जा सके, तो यह हमारे हित में होगा। सुरक्षा के लिहाज से आयात के बजाए ग्लोबल ओइएम को भारत में सिस्टम का उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित करना बेहतर होगा। डिफेंस मैन्यूफैक्चरिंग इंडस्ट्री एक मल्टी टेक्नोलॉजी सेक्टर है। डिफेंस प्रोडक्ट जटिल सिस्टम हैं। इसे तैयार करने के लिए कई वैज्ञानिक विधाओं और तकनीकी क्षेत्र से ज्ञान की जरूरत होती है।
एफडीआई की सीमा बढ़ने से रक्षा क्षेत्र में अहम प्रौद्योगिकी आएगी। हमें अपनी इस सोच को बदलना होगा कि हम अहम प्रौद्योगिकी खुद विकसित कर सकते हैं और हमें मौजूदा डिफेंस इंडस्ट्रस्ट्रियल बेस को विकसित करने के लिए लिए कदम उठाना चाहिए। ऐसी चिंताए हैं कि एफडीआई की सीमा बढ़ने से घरेलू उद्योग की ग्रोथ बाधित होगी। हालांकि अगर घरेलू इंडस्ट्री की उपलब्धियों और क्षमताओं का आकलन करते हैं, तो अंतर साफ दिखाई देता है। घरेलू इंडस्ट्री असेंबली में विशेषज्ञता रखती है, लेकिन डेवलपमेंट में हम बहुत कमजोर हैं।
एफडीआई की सीमा बढ़ाए जाने से भारतीय इंडस्ट्री खास कर निजी क्षेत्र के बीच संयुक्त उपक्रम स्थापित होंगे। निजी क्षेत्र को रक्षा उत्पादन में बड़ी भूमिका निभानी चाहिए। ग्लोबल ओइएम और निजी क्षेत्र के बीच गठजोड़ को सक्रिय तौर पर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। भारत को ओइएम को प्रौद्योगिकी साझा करने के लिए प्रोत्साहित करने का रवैया अपनाना चाहिए। यह 15 वर्ष पहले तैयार किए गए इंडियन आर्म्ड फोर्सेज लांग टर्म इंटीग्रेटेड पर्सपेक्टिव प्लान में अंतर्निहित भारत के रक्षा उद्देश्य को समर्थन भी करता है।
इस बात का उल्लेख करना भी अहम होगा कि औद्योगिक नीति एवं संर्वधन विभाग ने औद्योगिक लाइसेंस की जरूरत वाले रक्षा उपकरणों की 26 वीं सूची तैयार की है। इस सूची के मुताबिक सिर्फ फुल वैपन सिस्टम, डिफेंस एयरक्राफ्ट, वारशिप आदि के लिए औद्योगिक लाइसेंस की जरूरत है।
यह माना जा रहा है कि केंद्र सरकार का इरादा इस सूची में कवर नहीं किए गए रक्षा उपरकणों के लिए ऑटोमैटिक रूट से 100 फीसदी एफडीआई की अनुमति देने का है। इस बारे में सरकार की ओर से स्पष्टीकरण आने से स्पष्टता आएगी और निवेशक आश्वस्त होंगे। हमें देश में डिफेंस मैन्यूफैक्चरिंग के लिए इकोसिस्टम विकसित करने के साथ सेक्टर को एफडीआई के लिए खोलने को लेकर निर्णायक कदम उठाने चाहिए। इससे देश में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी आएगी और भारत ग्लोबल ओइएम के आपूर्ति तंत्र का भाग बन सकेगा।
डॉ विवेक लाल, इंडो-अमेरिकन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स द्वारा शुरू किए गए इंडो-यूएस स्ट्रेटेजिक डायलाग के चेयरमैन और साइबर सिक्योरिटी,डिफेंस व एअरोस्पेस के जाने-माने एक्सपर्ट हैं।