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तेल की कीमतों में गिरावट ऊर्जा क्षेत्र में लाएगी कई नए ट्रेंड
नई दिल्ली/ सुजय मेहदूदिया
Updated Fri, 13 Mar 2015 09:04 PM IST
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कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट ने ऊर्जा क्षेत्र को कई तरह की जिज्ञासाओं से भर दिया है। साथ ही इसने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश आने को लेकर भी सवाल खड़ा कर दिया है। कुल मिलाकर कच्चे तेल की सस्ती कीमतों ने ऊर्जा और पर्यावरण क्षेत्र की स्थिति को इस वक्त एक रोचक मुकाम पर ला दिया है। ग्लोबल ग्रोथ कंसल्टिंग फर्म फ्रास्ट एंड सुलिवेन ने मौजूदा हालात को देखते हुए आने वाले समय में इस क्षेत्र में कई नई तरह के रुझान दिखाई देने के आसार जताए हैं।
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फ्रास्ट एंड सुलिवेन एक रिपोर्ट जारी कर बताया गया है कि देश के ऊर्जा और पर्यावरण क्षेत्र में वर्ष 2015 में मुख्य रूप से 15 तरह के चलन या रुझान (ट्रेंड) देखने को मिलेंगे। रिपोर्ट के मुताबिक इस पूरे साल में कच्चे तेल की कीमतें 60 डॉलर प्रति बैरल के स्तर के नीचे बने रहने के आसार हैं। तेल के साथ ही गैस की कीमतों में भी गिरावट का रुख बने रहने के आसार हैं। गैस की कीमतों में यह नरमी यूरोप में गैस का उत्पादन बढ़ने के चलते रहेगी। इससे गैस क्षेत्र में निजी कंपनियों की रुचि बढ़ने से इस सेक्टर में निवेश बढ़ने की उम्मीद है।
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रिपोर्ट में कहा गया है कि तेल की कीमतों में गिरावट पावर सेक्टर के तहत विभिन्न क्षेत्रों में निवेश को लेकर कई तरह के सवाल खड़े कर सकती है। यह संसाधनों के दक्षता पूर्ण उपयोग को एक अहम मुद्दा बना देगी। इसके अलावा इसके चलते बिल्डिंग, लाइटिंग और जल प्रबंधन के क्षेत्र में नई तकनीकों के इस्तेमाल को भी बढ़ावा मिलेगा।
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रिपोर्ट में कहा गया है कि तेल में गिरावट के बावजूद अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश की स्थिति मजबूत बनी रहेगी। इसकी वजह यह है कि दुनिया में तेल से महज पांच फीसदी बिजली का उत्पादन किया जाता है और कई देशों में तो यह एक फीसदी से भी कम है। दूसरी ओर सोलर पैनल और अन्य जरूरी उपकरणों की कीमतों में कमी आने के चलते नवीकरणीय ऊर्जा की उत्पादन लागत घटने से इस क्षेत्र में निवेश आएगा। सरकार की ओर से सौर ऊर्जा से बिजली उत्पादन का लक्ष्य तय किए जाने और इन संयंत्रों को प्रिफरेंशियल ग्रिड एक्सेस दिए जाने से नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा मिलेगा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ऊर्जा और पर्यावरण क्षेत्र के नए ट्रेंड कंपनियों को अपने बिजनेस मॉडल की समीक्षा और उसमें बदलाव करने को मजबूर करेंगे। इससे कंपनियां प्रोडक्ट पर फोकस करने के बजाय सॉल्यूशन पर फोकस करने की रणनीति अपनाने की ओर बढ़ेंगी। इसके अलावा लोगों की जरूरत के मुताबिक नवीनता (इनोवेटिंग फॉर सोसाइटी) का ट्रेंड भी ऊर्जा क्षेत्र में देखने को मिलेगा। इससे लोगों को उनकी जरूरत के मुताबिक नए उपयोगी उत्पाद मिलेंगे। यह उत्पाद कंपनियों के मुनाफे में भी अच्छी बढ़ोतरी करेंगे।
रिपोर्ट में बताया गया है कि 2014 के अंत तक एलईडी लैंपों ने लाइटिंग बाजार में करीब 40 फीसदी की हिस्सेदारी प्राप्त कर ली थी। इस श्रेणी में नए और उन्नत उत्पाद आने से 2015 में बाजार पर इसकी पकड़ और बढ़ने की उम्मीद है। इससे वैल्यू चेन में बढ़ोतरी तो होगी पर उत्पादन के लिए नई तकनीक हासिल करने की जरूरत कंपनियों पर वित्तीय बोझ भी बढ़ा देगी। इससे बिजनेस मॉडल में बदलाव की जरूरत महसूस की जाएगी। इसके अलावा ऊर्जा क्षेत्र में री-शोरिंग का ट्रेंड भी इस साल बढ़ता दिखेगा। इसके तहत उत्पादों का विनिर्माण उपभोक्ताओं के आस-पास के क्षेत्रों में ही करने को तरजीद दी जाएगी, जिससे कि उत्पादों को लोगों तक जल्द पहुंचाया जा सके। हालांकि उत्पादन के इस विकेंद्रीकरण से बौद्धिक संपदा को लेकर जोखिम भी बढ़ सकता है।