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निर्णय लेने में आईएएस अधिकारी ज्यादा देर लगाते हैं?
अमर उजाला, दिल्ली
Updated Wed, 27 Nov 2013 01:08 PM IST
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घरेलू अर्थव्यवस्था की विकास दर दशक के सबसे निचले स्तर पर है। मौजूदा आर्थिक हालात और अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर अमर उजाला के सीनियर एडिटर हरवीर सिंह ने आर्थिक मामलों के सचिव अरविंद मायाराम से लंबी बातचीत की। पेश है इसके मुख्य अंश-
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क्या आर्थिक फैसलों में भ्रष्टाचार को लेकर अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई से नौकरशाही में फैसले लेने में हिचक बढ़ी है?
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि जिस तरह से जांच हो रही है उसका कुछ असर तो निर्णय लेने की क्षमता पर पड़ता है। अधिकारी ज्यादा सावधानी से काम करने लगते हैं और फैसलों में देरी होती है। वित्त मंत्री जी ने हाल ही में सीबीआई की कांफ्रेंस में कहा भी था कि जो निर्णय हम लेते हैं वह सही या गलत हो सकते हैं। फैसले के समय उपलब्ध जानकारी और फैसले लेने वाले अधिकारी की नीयत को देखा जाना है और हर गलत फैसले के पीछे भ्रष्टाचार नहीं देखना चाहिए।
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आपको लगता है कि इसका असर है?
हां, नौकरशाही द्वारा फैसले लेने में इसका असर दिख रहा है।
आपको लगता है कि जांच एजेंसियां सुर्खियां बटोरने के लिए जानकारी लीक करने में जल्दबाजी दिखा रही हैं?
इस मामले में मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि किसी भी जनतांत्रिक व्यवस्था में चेक और बैलेंस जरूरी है। लेकिन मैं यह जरूर मानता हूं कि इस समय हमें बहुत स्थिरता और गंभीरता के साथ राष्ट्र हित में फैसले लेने चाहिए।
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सरकार ने अटकी परियोजनाएं और आर्थिक सुधारों की दिशा में जो फैसले लिए क्या इकोनॉमी पर उनका असर दिख रहा है?
आपने जो प्रश्न पूछा है यह महत्वपूर्ण है। मैं मैक्रो पिक्चर की ही बात कर सकता हूं। कोर सेक्टर के विकास के जो ताजा आंकड़े आए उनमें बिजली उत्पादन 12 फीसदी बढ़ा है। हालांकि तुरंत कोई नतीजा नहीं निकाला जा सकता है लेकिन गति जारी रहती है तो कोयला आवंटन और प्राइस पूलिंग सहित जो फैसले हुए थे, इसे उसके नतीजे के रूप में देखा जा सकता है।
कोर सेक्टर में तेजी के बावजूद आईआईपी में सिर्फ 2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई?
असल में कोर सेक्टर की बढ़ोतरी और दूसरे क्षेत्रों के बीच एक लैग (समयांतर) रहता है। बिजली उत्पादन में बढ़ोतरी का असर दूसरे क्षेत्रों में तीन-चार माह बाद दिखेगा। लेकिन मैं फिर कहूंगा कि एक माह के परिणाम पूरी स्थिति साफ नहीं करते हैं। जो नतीजे सामने आ रहे हैं उससे लगता है कि अर्थव्यवस्था में ग्रीन शूट (नया निवेश और परियोजनाएं) दिखने लगे हैं। कोर सेक्टर अगर आठ फीसदी बढ़ रहा है तो उसका मतलब है कि इंफ्रास्ट्रक्चर में विकास हो रहा है।
लेकिन महंगाई तो बढ़ती ही जा रही है?
थोक मूल्य सूचकांक की बजाय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक ज्यादा बढ़ा है। महंगाई के मामले में हम एक ढांचागत बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। कुछ उत्पादों की मांग और आपूर्ति में अंतर बढ़ रहा है और इसके लिए जो योजनाएं बनाई गई हैं उनके नतीजे अभी नहीं दिख रहे हैं। आजकल हर मामले में सुधार की उम्मीद केंद्र से ही की जाती है। मसलन, प्याज के दाम बढ़ने से रोकने का जिम्मा भारत सरकार का मान लिया गया है। लेकिन हकीकत यह है कि कृ षि राज्यों का जिम्मा है और राज्य सरकारों को फल व सब्जियों के दाम कम करने के लिए कदम उठाने चाहिए। चूंकि, मीडिया दिल्ली सेंट्रिक है और इसीलिए सारे सवाल केंद्र से पूछे जाते हैं। महंगाई एग्रीकल्चर मार्केट प्रोड्यूस कमेटी (एपीएमसी) एक्ट की वजह से बढ़ी है। हम राज्यों को सिफारिश कर चुके हैं कि इसे समाप्त किया जाए क्योंकि इसका मकसद पूरा हो चुका है।
दावा था कि रिटेल में एफडीआई से उपभोक्ता को राहत मिलेगी?
हमने कोशिश की लेकिन अभी सहमति नहीं बन रही है। इसके साथ हमें इस समस्या को नए नजरिए से देखना होगा। हमें उत्पादन बढ़ाने के लिए निवेश बढ़ाने की जरूरत है लेकिन अगर कर्ज महंगा है तो निवेश कैसे बढ़ेगा। हमारा मानना है कि मौद्रिक उपाय महंगाई को कम करने का अकेला उपाय नहीं है, इस पर चर्चा की जरूरत है।
घाटा कम करना सरकार की बड़ी चिंता है। इसे लेकर क्या अनुमान हैं?
जिस तेजी से हालात सुधरे हैं, उससे चालू खाते का घाटा (सीएडी) 60 अरब डॉलर से नीचे आ जाएगा। राजकोषीय घाटा के 4.8 फीसदी के लक्ष्य को हम में हासिल कर लेंगे।
लेकिन क्या इसके लिए खर्च में कटौती हो रही है?
अगर हमें राजकोषीय घाटे को काबू में लाना है तो खर्च कम करना ही होगा क्योंकि राजस्व उतना ज्यादा नहीं बढ़ रहा है। जहां तक सब्सिडी की बात है, खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने पर भी खाद्य सब्सिडी बजट प्रावधान के अनुरूप ही रहेगी। हमने 93 हजार करोड़ के अलावा 10 हजार करोड़ का अतिरिक्त बजटीय प्रावधान भी किया है।
एनएसईएल घोटाले में नियामक व्यवस्था की नाकामी सामने आई है। एफएमसी को कमजोर रेगुलेटर माना गया है?
एफएमसी को मजबूत करने का कानून संसद में लंबित है। जिस तरह से कमोडिटी फ्यूचर मार्केट बहुत बड़ा हो गया है। ऐसे में मजबूत एफएमसी की जरूरत है लेकिन अभी स्टाक मार्केट व कमोडिटी मार्केट के लिए सिंगल रेगुलेटर का समय नहीं आया है।
एनएसईएल पर आपकी अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों का क्या हुआ?
अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। अगले कुछ माह में स्थिति साफ हो जाएगी। हमने सारे तथ्यों को देखकर जो सिफारिशें दी थी, उसके आधार पर संबंधित एजेंसियां जांच कर रही हैं। निवेशक भी जांच से संतुष्ट नजर आ रहे हैं।
रुपये और निर्यात को लेकर आगे क्या रणनीति है?
निर्यात के मोर्चे पर हमारी स्थिति बेहतर हो रही है। जहां तक रुपये की बात है तो मेरा मानना है कि यह 60 से 62 रुपये प्रति डॉलर के बीच रहेगा।