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जानिए, 0% फाइनेंस स्कीम के भ्रमजाल की हकीकत
दिल्ली
Updated Thu, 26 Sep 2013 03:11 PM IST
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भारतीय रिजर्व बैंक(आरबीआई) ने क्रेडिट कार्ड के जरिए जीरो फीसदी स्कीम पर रोक के बाद कंपनियों को अपनी त्योहारी उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आ रहा है।
दरअसल, क्रेडिट कार्ड से जीरो फीसदी फाइनेंस स्कीम का भ्रमजाल इस तरह बनाया गया है कि यह ग्राहकों के लिए फायदेमंद न होकर उनसे अप्रत्यक्ष रूप से पैसे ऐंठने का तरीका बन गई है।
असलियत यह है कि बिना ब्याज चुकाए ईएमआई चुकाने के लालच में ग्राहकों को प्रोडक्ट के वाजिब मूल्य से अधिक चुकाना पड़ जाता है। आमतौर पर कंपनियां या रिटेलर जीरो फीसदी ईएमआई पर प्रोसेसिंग शुल्क के रूप में ब्याज की वसूली कर लेते हैं।
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एक आकलन के मुताबिक त्योहारी सीजन में जीरो फीसदी ईएमआई स्कीम के जरिए कंपनियों और रिटेलरों की करीब 20-30 फीसदी की बिक्री होती है।
रिजर्व बैंक द्वारा इस स्कीम पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद अब कंपनियों को डर सता रहा है कि ग्राहक त्योहारी सीजन में खुलकर खरीदारी नहीं कर पाएंगे।
क्या है हकीकत
अगर कोई जीरो फीसदी फाइनेंस स्कीम के तहत उत्पाद खरीदता है, तो उसे नकद खरीद पर मिलने वाली कोई छूट नहीं मिलती है। उल्टे उसे प्रोसेसिंग शुल्क के रूप में अच्छी खासी रकम देनी पड़ जाती है।
इस स्कीम के तहत कंपनियां या रिटेलर फाइल चार्ज के नाम से एक फिक्स रकम अलग से वसूलते हैं। यह रकम उत्पाद की कीमत के अतिरिक्त होती है। यानी, यह रकम एक तरह से ब्याज ही होती है।
स्कीम का यह है फंडा
मान लीजिए, 40 हजार रुपए के एमआरपी वाले टीवी पर जीरो फीसदी ईएमआई स्कीम है। यदि आप इसे नकद में खरीदते हैं और इस पर 10 फीसदी छूट मिलती है, तो आपको टीवी के लिए 36 हजार रुपए देने पड़ेंगे। वहीं, यदि आप जीरो फीसदी स्कीम पर खरीदते हैं, तो टीवी की एमआरपी पर 10 की छूट नहीं मिलेगी।
साथ ही आपको करीब 1,000-1,500 रुपए तक प्रोसेसिंग शुल्क के रूप में अतिरिक्त देने पड़ेंगे। इस तरह, छह माह की ईएमआई पर 36 हजार की जगह 41,000-41,500 रुपए चुकाने पड़ेंगे।
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दरअसल, क्रेडिट कार्ड से जीरो फीसदी फाइनेंस स्कीम का भ्रमजाल इस तरह बनाया गया है कि यह ग्राहकों के लिए फायदेमंद न होकर उनसे अप्रत्यक्ष रूप से पैसे ऐंठने का तरीका बन गई है।
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असलियत यह है कि बिना ब्याज चुकाए ईएमआई चुकाने के लालच में ग्राहकों को प्रोडक्ट के वाजिब मूल्य से अधिक चुकाना पड़ जाता है। आमतौर पर कंपनियां या रिटेलर जीरो फीसदी ईएमआई पर प्रोसेसिंग शुल्क के रूप में ब्याज की वसूली कर लेते हैं।
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एक आकलन के मुताबिक त्योहारी सीजन में जीरो फीसदी ईएमआई स्कीम के जरिए कंपनियों और रिटेलरों की करीब 20-30 फीसदी की बिक्री होती है।
रिजर्व बैंक द्वारा इस स्कीम पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद अब कंपनियों को डर सता रहा है कि ग्राहक त्योहारी सीजन में खुलकर खरीदारी नहीं कर पाएंगे।
क्या है हकीकत
अगर कोई जीरो फीसदी फाइनेंस स्कीम के तहत उत्पाद खरीदता है, तो उसे नकद खरीद पर मिलने वाली कोई छूट नहीं मिलती है। उल्टे उसे प्रोसेसिंग शुल्क के रूप में अच्छी खासी रकम देनी पड़ जाती है।
इस स्कीम के तहत कंपनियां या रिटेलर फाइल चार्ज के नाम से एक फिक्स रकम अलग से वसूलते हैं। यह रकम उत्पाद की कीमत के अतिरिक्त होती है। यानी, यह रकम एक तरह से ब्याज ही होती है।
स्कीम का यह है फंडा
मान लीजिए, 40 हजार रुपए के एमआरपी वाले टीवी पर जीरो फीसदी ईएमआई स्कीम है। यदि आप इसे नकद में खरीदते हैं और इस पर 10 फीसदी छूट मिलती है, तो आपको टीवी के लिए 36 हजार रुपए देने पड़ेंगे। वहीं, यदि आप जीरो फीसदी स्कीम पर खरीदते हैं, तो टीवी की एमआरपी पर 10 की छूट नहीं मिलेगी।
साथ ही आपको करीब 1,000-1,500 रुपए तक प्रोसेसिंग शुल्क के रूप में अतिरिक्त देने पड़ेंगे। इस तरह, छह माह की ईएमआई पर 36 हजार की जगह 41,000-41,500 रुपए चुकाने पड़ेंगे।